Thursday, April 24, 2014

खुले आसमान में उड़ने का ख़्वाब


घर के अन्दर पसरी हुई ख़ामोशी ने
मुझे अपनी बाँहों में जकड़ रखा है...
छिटक कर उससे आज़ाद होना चाहती हूँ
घबरा कर घर के बाहर भागती हूँ .
वहाँ भी धूप सहमी सी है आँगन में
सूरज भी खड़ा है बड़ी अकड़ में
मजाल नहीं हवा की
एक सिसकी भी ले ले...
हौंसला मुझे देते हैं कबूतर के जोड़े
दीवारों पर आ बैठते हैं मेरा साथ देने
घुघुती भी एक दो आ जाती हैं
सुस्ताती हुई बुदबुदाती है जाने क्या
गौरेया को देखा छोटी सी है
निडर फुदकती इधर से उधर
उसकी चहक से ख़ामोशी टूट जाती है
उससे हौंसला पाकर नज़र डालती हूँ
अपनी ठहरी हुई ज़िन्दगी पर
ज़िसके अन्दर कुछ जम सा गया है
सोचती हूँ रगड़ रगड़ कर उतार दूँ
उस पर जमी डर की काई को
फिर से परवाज़ दूँ अपने जमे पंखों को

खुले आसमान में उड़ने का आग़ाज़ करूँ ....




8 comments:

Basant Khileri said...

बहुत हि अच्छी जानकारी।
नई प्रस्तुती- Download windows-7

रचना said...

all the best for all that you wish

Ankur Jain said...

bahut sundar rachna...

प्रतिभा सक्सेना said...

जहाँ चाह हो वहाँ राह भी बन जाती है -अगर सच मे चाह है तो !

संजय भास्‍कर said...

बहुत भावपूर्ण रचना .... मन की कसक को कहती हुई ।

abhi said...

पढ़ा वो आर्टिकल और उसके बाद आपकी ये कविता !!
क्या कहूँ?

Digamber Naswa said...

परवाज़ पर जाने कि सोचना चाहिए .. वो भी कैसे जा सकूं, तैयारी करनी चाहिए ... जाने के बाद सपने तो साकार होने ही हैं ... ये नहीं तो कोई और ... फिर परवाज़ का आनद भी तो साथ होता है ....

मीनाक्षी said...

आपका सबका शुक्रिया...
@अभि ... न कुछ कह पाते हैं न कुछ कर पाते हैं.. इस विवशता के साथ जीना आसान नहीं...
@दिगम्बर भाई..शायद आपने जुड़ा लेख नहीं पड़ा...13 साल से कोशिश लेकिन आज भी नाक़ाम...