Wednesday, July 17, 2013

सुधा की कहानी उसकी ज़ुबानी (समापन किश्त )

गूगल के सौजन्य से 

सुधा अपने आप को अपनों में भी अकेला महसूस करती है इसलिए अपने परिचय को बेनामी के अँधेरों में छिपा रहने देना चाहती है....  मुझे दीदी कहती है...अपने मन की हर बात मुझसे बाँट कर मन हल्का कर लेती है लेकिन कहाँ हल्का हो पाता है उसका मन.... बार बार अतीत से अलविदा कहने पर भी वह पीछे लौट जाती है...भटकती है अकेली अपने अतीत के जंगल में ....ज़ख़्म खाकर लौटती है हर बार...
उसका आज तो खुशहाल है फिर भी कहीं दिल का एक कोना खालीपन से भरा है.... 'दीदी, क्या करूँ ...मेरे बस में नहीं... मैं अपना खोया वक्त वापिस चाहती हूँ ' .... वर्तमान की बड़ी बड़ी खुशियाँ भी उसे कुछ पल खुश कर पाती हैं फिर वह अपने अतीत में चली जाती है.....   
सुधा की कहानी उसकी ज़ुबानी -  भाग (एक) , (दो) , (तीन) , (चार) , (पाँच) , (छह) (सात) (आठ)  (नौ) 

सुधा की कहानी चाहे आज यहाँ खतम हो जाए लेकिन असल ज़िन्दगी में तो उसका हर दिन एक नई कहानी के साथ शुरु होता है और आगे भी होता रहेगा...देखा जाए तो हम सब की ज़िन्दगी का हर दिन नई कहानी के साथ शुरु होता है. पिछले दिनों हम भी बच्चों के साथ थे. मिलना जितना आनन्द देता है बिछुड़ना उतना ही दुख. सुधा का छोटा बेटा जो पिछले दिनों दिल्ली अकेले रह कर नौकरी की तलाश कर रहा था, धीरे धीरे 'डिप्रेशन' में जाने लगा था. वही नहीं उसके कई दोस्त बेरोज़गारी के शिकार तनाव में डूबते उतरते जी रहे थे या कहूँ कि जी रहे हैं. अच्छी पढ़ाई लिखाई करने के बाद भी अगर नौजवानों को नौकरी नहीं मिलती तो उनकी ज़िन्दगी अच्छी बुरी किसी भी दिशा की ओर बढ़ेगी, इसके बारे में वे खुद भी नहीं जान पाते. 
सुधा के पति ने छोटे बेटे को अपनी ही कम्पनी में लगवा लिया और अब वह अपने माता-पिता के साथ खुश है. जितना खुश अपने लिए है उतना ही दुखी है अपने बेरोज़गार दोस्तों के लिए. अपने बेटे के मुँह से जब सुधा उसके दोस्तों की कहानियाँ सुनती है तो उसे अपना अतीत याद आ जाता है कि अपने देश में नौकरी की तलाश करते हुए धीरज कैसे हिम्मत हार बैठे थे. बूढ़े माँ बाप और पत्नी को अकेला छोड़ना आसान नहीं था लेकिन जीने के लिए जो साधन चाहिए होते हैं उसके लिए पैसे की ज़रूरत होती है. दोस्त , रिश्तेदार और समाज बोलने को बड़ा सा मुँह खोलकर ऊँची ऊँची बातें तो करेंगे लेकिन आगे बढ़ कर कोई मदद नहीं करेगा. 
भूखे पेट भजन न होए ..... पेट भरा हो तो उपदेश देना भी आ जाता है. उस वक्त भी सुधा ने ही निर्णय लिया था कि घर परिवार की खातिर धीरज को अगर विदेश में नौकरी मिलती है तो निश्चिंत होकर जाए. उस वक्त सुधा ने सोचा नहीं था कि जो समाज बड़ी बड़ी बातें करता है वही छोटी छोटी ओझी हरकतों से जीना हराम भी कर देगा. 
ज़िन्दगी के हर मोड़ पर अकेली औरत का मनोबल तोड़ने के लिए समाज के सफ़ेदपोश छिपकर वार करते हुए अचानक सामने आकर डराने लगते हैं. अपने आप को देशभक्त कहने वाले लोग नेताओं को कोसने के सिवा और कुछ नहीं कर पाते. हाँ वक्त के मारे लोगों पर तानाकशी करने से बाज़ नहीं आएँगें. सुधा के मन में कई सवाल उठते हैं .... तीखे सवाल जिनका जवाब किसी के पास नहीं है. सबके पास अनगिनत उपदेशों का पिटारा है. 
एक नहीं हज़ारों सुधाएँ हैं हमारे देश में. जिन्हें बचपन से ही दबा दबा कर दब्बू बना दिया गया. पैदा होते ही उसे ऐसी शिक्षा दी गई कि पुरुष पिता, भाई , पति और पुत्र के रूप में उसका स्वामी है. धर्म से उसका ऐसा नाता जोड़ दिया जाता है कि कोई कदम उठाने से पहले वह सौ बार सोचती है कि अगर आवाज़ उठाने से पुरुष का कोई रूप उससे नाराज़ या दुखी हो गया तो वह पाप होगा और वह नरक में जाएगी. उनकी दासी बन कर ही जीना उसकी नियति है. 
सुधा के विचार में आजकल की पढ़ी लिखी आज़ाद ख्याल औरतें भी कहीं न कहीं उसी दासत्व की शिकार हैं तभी बार बार आज़ादी की बातें करतीं हैं. बूढ़े लाचार माता-पिता को बेसहारा छोड़कर अगर सुधा अपने बच्चों को लेकर मायके चली जाती तब भी समाज के ठेकेदार बुरा भला कहने से बाज़ न आते. सुधा की ज़ुबानी  "औरत की आज़ादी की बात करने वाले लोग मेरी जगह खड़े होकर सोचें कि पति के बूढ़े माँ बाप की सेवा करना उचित है या अपनी आज़ादी...उस आज़ादी का क्या करना जिसका आनन्द लेते हुए बूढ़े माता-पिता को बेसहारा और अकेला छोड़ दिया जाए चाहे उनकी तानाशाही ही क्यों न सहनी पड़े हैं वे अपने बड़े ही जिनको मान सम्मान देंगे तो आने वाली पीढ़ी भी वही सीखेगी." 
सुधा का विश्वास है कि बड़ों की सेवा का फल है जो आज उसके दोनों बच्चे अच्छे संस्कारों के धनी हैं. वे भी अपने माता-पिता की सेवा के लिए हर पल तत्पर हैं. यही नहीं बहू कोमल भी बेटी बनकर परिवार में रच बस गई है. सुधा के सेवाभाव से उसके भरे पूरे परिवार में सब कुछ अच्छा ही अच्छा हो रहा है.  
इतने दिनों बाद समापन किश्त लिखते हुए मेरे मन में भी सुधा को लेकर हज़ारों सवाल थे जिनके सवाल पाने के लिए सुधा के मन को बहुत टटोला. बहुत कुछ समझा जाना.  लेकिन यहाँ रखकर उसका दिल दुखी नहीं करना चाहती. सुधा को एक औरत की जगह अगर इंसान के रूप में देखा जाए तो इंसान तो अनगिनत चाहतों का भंडार है. बहुत कुछ पाकर भी बहुत कुछ पाने की चाहत उसे चैन से जीने नहीं देती. सब कुछ पाकर भी उसे लगता है कि उसने बहुत कुछ खो दिया है जिसे पाने की चाहत इस जीवन में तो पूरी होगी नहीं. देखा जाए तो हम सब अपने अपने मन के गहरे और अथाह समुन्दर में उठने वाली अनगिनत लहरों की चाहतों में डूबते उतरते हैं...बस इसी डूबने उबरने में ज़िन्दगी तमाम हो जाएगी...!! 

यहाँ अपनी ज़िन्दगी के कुछ हिस्से को अपनी ज़ुबानी कह कर  सुधा का दिल कुछ हलका हुआ फिर भी जानती हूँ उसके तन-मन की कभी न खतम होने वाली तिश्नगी को.......

मेरी पसन्द का एक गीत सुधा के नाम......