नियमित सैर के लिए किसी गंभीर बीमारी का होना ज़रूरी नहीं है...बस यूँ ही नियम से चलने की कोशिश है एक. आजकल सुबह सवेरे भी निकलते हैं सैर के लिए... सुबह सवेरे मतलब साढ़े सात आठ बजे......दोष हमारा नहीं...सूरज का है..(दूसरों पर दोष डालना आसान है सो कह रहे हैं) ... उसे ही जल्दी रहती है निकलने की... जाने क्यों कभी आलस नहीं करता.... निकलता भी है तो खूब गर्मजोशी से .... हम भी उसी गर्मजोशी से उसका स्वागत करते हुए सैर करते हैं लेकिन साया बेचारा....बस उसे देखा और कुछ लिखा दिया कविता जैसा.....
सुबह सवेरे सूरज निकला
मैं और मेरा साया भी निकला
सूरज पीछे....साया आगे
हम सब मिल कर सैर को भागे
देखूँ साए को आगे चलता
पीछे मेरे सूरज है चलता
ज्यों ज्यों मेरी दिशा बदलती
त्यों त्यों साए की छाया चलती
आगे सूरज पीछे साया
पीछे सूरज आगे साया
आते जाते पेड़ों की छाया में
छिपता उनमें मेरा साया
आगे पीछे मेरे होता
सूरज की गर्मी से बचता
लुकाछिपी का खेल था न्यारा
साया मेरा मुझको प्यारा
16 comments:
सुन्दर अभिव्यक्ति
सुंदर!
खूब .... गहरी अभिव्यक्ति
meri aankhon ke aage yah aankhmichauli jivant ho uthi
बहुत ही सुंदर....
sundar
bahut khub
कविता तो खूबसूरत है लेकिन ... साए की छाया ... ये कुछ समझ नहीं आया :)
सुन्दर सैर के साथ सुन्दर कविता...
@संजय..'साए की छाया चलती' अतीत में ले गई जब तपते रेगिस्तान की धूप से बचने के लिए मेरे साए की छाया में बच्चे कभी कभी चलते हुए स्कूल से घर पैदल ही पहुँचते...
wah sair, saya, suraj aur chhaya kya baat hai. sunder srijan ho gaya ye to.
badhayi.
Hi I really liked your blog.
I own a website. Which is a global platform for all the artists, whether they are poets, writers, or painters etc.
We publish the best Content, under the writers name.
I really liked the quality of your content. and we would love to publish your content as well. All of your content would be published under your name, so that you can get all the credit for the content. For better understanding,
You can Check the Hindi Corner of our website and the content shared by different writers and poets.
http://www.catchmypost.com
and kindly reply on ojaswi_kaushal@catchmypost.com
एक अच्छी पोस्ट बधाई |
आशा
कविता तो बहुत ही स्वीट है :)
लेकिन मेरे साथ थोड़ी दिक्कत ये है की मैं सुबह वाक पे पांच-छः के बीच निकलता हूँ, छः से देरी हो जाए तो नहीं निकलता.. :P
achha likha hai aapne...
http://teri-galatfahmi.blogspot.com/
सूरज और साये का खेल ... मज़ा आ गया इस लाजवाब रचना पढ़ के ... जीवन के इस खेल को पढ़ के ...
Post a Comment