Wednesday, July 27, 2011

सपने डराते भी हैं... .!

सपने अक्सर् सुहाने होते हैं लेकिन जब डराते हैं तो फिर भूलते नहीं.... कुछ् दिन से फिर शुरु हुए प्लेन क्रेश के सपने.... अच्छी तरह से जानती हूँ कि एक दिन हम सबने जाना है इसलिए मौत से भागना बेकार है.....

कभी बहुत पहले कनिष्का प्लेन क्रेश से भी पहले से हवाई दुर्घटना के सपने आते थे.... दूर आकाश में उड़ते जहाज़ों को क्रेश होते देखती हूँ .... कभी उनमें बैठी नहीं..... बीच बीच में ऐसे सपने आना बंद हो जाते हैं.... अब फिर से शुरु हुए वही सपने.... पिछले हफ्ते..... कल रात फिर ....... खड़ी हूँ धरती पर...नज़र है आकाश पर..... चाँद तारे क्यों नहीं दिखते.... सिर्फ हवाई जहाज़ ही क्यों दिखते हैं..... दिखते हैं तो दिखें...... लेकिन अचानक अपने रास्ते से भटकते.... तेज़ी से घूमते.. चक्कर लगाते.... धड़ाम से नीचे गिरते ही क्यों दिखाई देते हैं....... आजकल फिर से इन सपनों ने तंग करना शुरु कर दिया है.....

कुछ सपने दिल और दिमाग की डायरी में दर्ज हो जाते हैं और कुछ पल भर के लिए ही ज़िन्दा रह पाते हैं...

*बचपन का एक ही सपना याद रह जाता है .... ऊपर से नीचे की तरफ गिरना....

*समुद्र के किनारे एक किशोर लड़के को अजीब सी पोशाक में खड़े देखना... जो टकटकी लगाए मुझे देखता रहता है बिना कुछ बात किए.....सालों तक यह सपना आता रहा... फिर सच हो गया...

* एक बड़ा आलीशान घर हवेली जैसा.... ऊपर की ओर जाती लाल कालीन से ढकी सीढियाँ और उस पर चलता एक काले रंग का मकोड़ा......

*एक काला हाथ ...जबरन पकड़ कर अपनी ओर खींचता ......

*सफेद कपड़ों में लिपटी एक ममी को दरवाज़े की दहलीज पर खड़े मेरी तरफ देखना... चेहरा कभी दिखाई नहीं दिया....ऐसा लगता कि वह मेरी रक्षा के लिए दरवाज़े पर खड़ी है....

*सपनों में डैडी का आना.... हर सपने में मेरे करीबी दोस्त के साथ चिर परिचित मुस्कान के साथ बातें करना...असल ज़िन्दगी में एक बार मिले उस दोस्त को मम्मी डैडी अपना सा मानते जानते थे...

*रोते चाँद को देखना...फिर सपने में ही सोचना कि मुझे ही क्यों यह रोता चाँद दिखाई देता है....

*चाँद का पीला पड़ जाना..... उसके ऊपर काला जाला ....जिसे हटाने की पूरी कोशिश करना..... उसके बाद फीके चाँद का दिखना

* कई सपने आए और गए....लेकिन हवाई दुर्घटना के सपने हैं कि पीछा ही नहीं छोड़ते..... अनगिनत सपने हैं जिनमें प्लेन क्रेश होते हुए देखती हूँ और घबरा कर उठ जाती हूँ ... सभी सपनों में एक बात कॉमन है कि किसी भी हवाई जहाज़ में मैं कभी बैठी नहीं..... सभी को दूर से क्रेश होते देखती हूँ फिर भी मन बेचैन और अशांत हो जाता है....

इस वक्त मन शांत है.... मन कहता है मत घबरा.... हर हाल में खुश रहना है....ठान ले बस......
 मंज़िल तक जाने का रस्ता बदलेगा..... आसमान से...... आसमान में उड़ने की चाहत होगी पूरी ....
धरती पर..... धरती के आँचल में छिपने का सुख पाएगी..... जहाँ कहीं जैसे तैसे... जाना तो निश्चित है... !!


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