Wednesday, June 15, 2011

नूतन व पुरातन का समन्वय (कबीर जयंती)


"डॉअमर की पोस्ट पढ़ने पर ही पता चला कि आज कबीर जयंती है ... या अध्यापन के दिनों में पता चलता कि कौन सी जयंती किस दिन है...संत  कबीर और रहीम हमेशा से प्रिय रहे क्यों कि बच्चों  को पढ़ाते हुए उनका ज़िक्र न हो ऐसा हो ही नही सकता था...नवीं दसवीं के बच्चों को कबीर के दोहे याद कराने के लिए उनका अर्थ समझाने के लिए क्या क्या पापड़ नहीं बेले थे...कभी बच्चों को पॉप की नकल करके दोहे सुनाने की भी इजाज़त दे दी थी.... उन्हीं बच्चों के कारण ही ऐसा लेख लिख पाए कि किसी भी तरह जीवन मूल्यों का महत्त्व कहने वाले संत फकीर उन्हें याद रह पाएँ" 
(यह लेख 2007 में पोस्ट किया जा चुका है जब हमने अभी नया नया ब्लॉग बनाया ही था... किसी ने पढ़ा भी न हो शायद....आज 'कबीर जयंती' के  दिन फिर से इसे पोस्ट करने का श्रेय डॉ अमर को जाता है)


भारतेन्दु युग से नूतन और पुरातन के बीच संघर्ष रहा है। भाषा के विकास के लिए भाषा से जुड़े‌ विषयों को पुराना ही रहने दें या नए-नए विषयों का समावेश किया जाए या पुराने विषयों का सरलीकरण किया जाए। इस संघर्ष में भारतेन्दु जैसे लेखकों ने तटस्थ न रहकर दिशा में नेतृत्व देकर आधुनिकता के आरम्भ के लिए ज़मीन तैयार की थी। आज फिर प्राचीन और नवीन के संधि-स्थल पर खड़े होकर कुछ विषयों को नया रूप देने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है।
महान् सन्त कबीर और रहीम जैसे समाज सुधारक और दार्शनिक कवियों ने छोटे-छोटे दोहे लिखकर मानव जीवन के व्यापारों एंव भावों का सफल चित्रण किया। समाज में एकात्मकता लाने के लिए काव्य को माध्यम बना कर जन-जन के मानस में पहुँचाने का कार्य किया लेकिन आज ये सन्त और उनका साहित्य धूल धूसरित रतन की भांति धूल में छिप गए हैं जो चिन्ता का विषय हैं।
"मेरी बोली पूरब की, समझे बिरला कोय।" कबीर जी की इस पंक्ति को पढ़ कर लगता है कि आज पुरातन को नवीनता का रूप लेना ही होगा अन्यथा नई पीड़ी उनकी शिक्षा से परिपूर्ण रचनाओं से लाभ उठाने से वंचित रह जाएगी।
पुरातन को नवीनता का रूप देने का भरसक प्रयत्न इस आशा से किया है कि विद्यार्थी ही नहीं आम जन-मानस भी सहज भाव से अर्थ ग्रहण कर सकेगा।

१ रहिमन धागा प्रेम का , मत तोड़ो चटकाय ।
टूटे से फिर न जुड़े , जुड़े गाँठ पड़ जाए ।।
"प्रेम का धागा , मत तोड़ो निष्ठुरता से ।
टूटा तो फिर जुड़ेगा , जुड़ेगा कई गाँठों से ।।"

२ ऐसी वाणी बोलिए , मन का आपा खोए।
औरन को शीतल करे , आपुहिं शीतल होए।।
"मीठे मधुर बोलों से , मन को वश में कर लो।
स्वयं को सभी को , शीतलता से भर दो ।।"

३ खीरा सर ते काटिए , मलियत लोन लगाए।
रहिमन कड़वे मुखन को , चहियत इहै सजाए।।"
"खीरा सिर से काटकर , नमक रगड़ा जाए ।
कड़वा बोल जो बोले , सर उसका पटका जाए।।"

४ चलती चाकी देख के , दिया कबिरा रोए।
दो पाटन के बीच में , साबुत बचा न कोए।।
"कबीर जी रोते थे , चलती चक्की को देखकर।
दो पाटों के बीच में, सभी मिटे पिस कर ।।"

५ माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंधें मोहे ।
इक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंधूँगी तोहे।।
"कुम्भकार से कहती मिट्टी, तू क्या मिटाएगा मुझे।
इक दिन ऐसा आएगा, मैं मिटा दूँगी तुझे।। "
मीनाक्षी धन्वन्तरि

(आबु धाबी में भारतीय राजदूत महामहिम श्री चन्द्र मोहन भण्डारी जी की अध्यक्षता में प्रथम मध्यपूर्व क्षेत्रीय हिन्दी सम्मेलन में छपी पत्रिका में प्रकाशित रचना । )

14 comments:

Udan Tashtari said...

दोहों- सूक्तियाँ -लोकोक्तियाँ आदि नये जमाने के लिए भी उतनी ही उपयुक्त और सामयिक है..इसलिए सरलीकृत व्याख्या की मांग करती हैं...स्वरुप भी बदला जा सकता है, यदि निहित संदेश सही सही अर्थों में प्रसारित हो....

इस दिशा में सार्थक प्रयासों की आवश्यक्ता है...

साधुवाद एवं कबीर जयंती की शुभकामनाएँ.

udaya veer singh said...

प्रथमतः आपको इस शुभ दिन के लिए धन्यवाद ,/ भक्त कबीर" श्री गुरुग्रंथ साहिब जी " में अपनी वाणियों सहित विद्यमान हैं ,नित वन्दनीय हैं ,इनकी वाणी [रचना ] अमृत धाराकीतरहहैजो समभाव,सदभाव,प्रेरणा
देती है समस्त मानव जाति को बिना किसी पूर्वाग्रह के / इसी लिए हमारे पावन,युगों -युग अटल गुरु ग्रन्थ साहिब में स्थान पाए ----
"टूटी जंजीर मेरी ,टूटी जंजर ,गंगा की लहर मेरी .... "
सार्थक पोस्ट ,बहुत बहुत धन्य वाद जी /

डा० अमर कुमार said...


मेरी पोस्ट कुछ अधिक ही बोझिल हो गयी है, कोई वाँदा नहीं...
नीर पियावत क्या फिरै, सायर घर-घर वारि ।
जो त्रिषावन्त होइगा सो पीवेगा झखमारि ॥
पर तृषावन्त ( प्यासी आत्मायें, जिज्ञासु ) ऎसी पोस्ट ढूँढ़ कर पढ़ ही लेंगे ।
आपकी पोस्ट बहुत सामयिक और पाठकों के मनोनुकूल है.. सरलीकरण के लिये साधुवाद ।
जब आप मुझे आगे कर कोई पोस्ट लाती हैं, तो मेरी वही हालत होती है.. जैसे कि,
क्या मुख लै विनती करौं लाज आवत मोहि ।
तुम देखत औगुन करौं कैसे भावों तोहि ॥

चलिये... ठीक है, ऎसी जुगलबन्दियों का भी अपना मज़ा है ।

Sunil Kumar said...

कबीर जयंती की शुभकामनायें , कबीर को जैसा समाज सुधारक शायद ही दूसरा कोई हो |

rashmi ravija said...

कबीर जयंती पर बहुत ही सामयिक पोस्ट....कई सारे भूले हुए दोहे याद हो आए.

मीनाक्षी said...

@समीरजी,,बच्चों की रुचि देखते हुए सरलीकरण करना ज़रूरी लगा था और उन दिनो सोचा भी था कि सरलार्थ करके जाँच करवाएँग़े..सोचते है इस अधूरे काम को पूरा किया जाए.
@सिंहजी..यही कामना है कि गुरुओं और संतों की वाणी पर ज़रा सा भी अमल कर सकें तो जीवन धन्य हो जाए.
@डॉअमर..हम जैसे सरल बुद्धि लोग और बच्चो को ही ऐसे सरलार्थ की ज़रूरत है..
@सुनीलजी..उन सा दूसरा न होगा तभी तो उन्हे कैसे भी हर युग मे ज़िन्दा रखने की कोशिश होनी चाहिए
@रश्मि...बच्चो के साथ मिल बैठ कर फिर से गुनगुना दो...उन्हे भी अच्छा लगेगा...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


कुछ चिट्ठे ...आपकी नज़र ..हाँ या ना ...? ?

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत बढ़िया प्रयास ... आभार

मेरे भाव said...

Meenakshi ji,

palkonkesapne par padharne ka dhanyawad. pahli baar aapko padhne ka mauka mila. bahut achchha laga. sadar

ashish said...

कबीर के दोहे आज भी प्रासंगिक है . सुँदर और सामयिक आलेख .

ajit gupta said...

सरलीकरण तो अपने कर दिया लेकिन दोहे का स्‍वरूप बदल दिया। यदि इन्‍हें दोहे के सांचे में ही रखती तो बेहतर था। इतने अच्‍छे दोहे अ-दोहे हो गए हैं। इसलिए इन्‍हें पुन: दोहे के रूप में लिखे मेरा ऐसा आग्रह है। यदि मेरी बात बुरी लगी तो मैं पहले ही क्षमा मांग लेती हूँ।

prerna argal said...

kabir jayanti ko yaad dilaane ke liye shukriyaa.kabir ke dohe to aaj bhi kaafi upyog main laye jaaten hain aaj ki peedhi ko jarur yaad dilaane aur padhwaane ki jarurat hai.bahut achcha aur upyogi lekh.badhaai.


please visit my blog.thanks.

मीनाक्षी said...

@अजितदी..आपका इस तरह कहना मुझे अच्छा लगा..कोशिश करूँगी कि सरलीकरण के दौरान दोहे अपना रूप न खोएं...क्षमा माँग कर आप मुझे शर्मिन्दा न कीजिए....

ZEAL said...

प्रासंगिक आलेख।