Thursday, May 5, 2011

अजन्मी बेटी का प्यारा सा खूबसूरत एहसास

कहीं न कहीं ऐसा कुछ घट जाता है जो मन को अशांत कर जाता है.......मन व्याकुल हो जाता है कि कोई उपाय हो जो सामने वाले का कष्ट दूर हो सके... लेकिन सभी को अपने अपने हिस्से का जीवन जीना है... चाहे फिर आसान हो या जीना दूभर हो जाए... सुधा की भी कुछ ऐसी ही कहानी है जिसे अपने लिए खुद फैंसला करना है....
जाने कैसे कैसे ख़्याल सुधा के मन में आ रहे थे...सुबह से ही उसका दिल धड़क रहा था....आज शाम रिपोर्ट आनी थी ... कहीं फिर से लड़की हुई तो....कहीं फिर से नन्हीं जान को विदा होना पड़ा तो.... नहीं इस बार नहीं...सुधा ने मन ही मन ठान लिया कि इस बार वह ऐसा कुछ नहीं होने देगी....
उसने पति धीरज को लाख समझाया था कि इस बार लड़का या लड़की जो भी होगा उसे बिना टैस्ट स्वीकार करेंगे......लेकिन तीसरी बार फिर माँ और बेटे में एक और ख़ून करने की साजिश हो रही थी...कितना रोई थी वह क्लिनिक जाने से पहले....पर सास ने चिल्ला चिल्ला कर सारा घर सिर पर उठा लिया था...’मुझे पोता ही चाहिए.... खानदान के लिए चिराग चाहिए बस’ पति चुप... बुत से हो गए माँ के सामने.. लाख मिन्नतें करने के बाद भी उनका दिल न पिघला... आखिर रोती सिसकती सुधा को क्लिनिक जाना ही पड़ा था....
डॉ नीना ने धीरज को एक कोने में ले जाकर खूब फटकारा था. ‘कैसे पति हो.. अपनी पत्नी की तबियत का तो ख्याल करो...तीसरी बार फिर से अगर टैस्ट करने पर पता चला कि लड़की ही है फिर क्या करोगे.... उसे भी खत्म करवा दोगे....’ धीरज की माँ ने सुन लिया और एकदम बोल उठी, ‘हाँ करवा देंगे....मुझे पोता ही चाहिए बस’
डॉ नीना कुछ न बोल पाईं.....चाहती तो पुलिस में रिपोर्ट कर देतीं लेकिन डोनेशन का बहुत बड़ा हिस्सा धीरज के पिता के नाम से क्लिनिक को आता था....न चाहते हुए भी डॉ को टैस्ट करना पड़ा...
सुधा अपने पति को देख कर मन ही मन सोच रही थी... जिसके मन में अपनी पत्नी के लिए थोड़ा सा भी प्रेम दिखाई नहीं दे... मैं इस आदमी के साथ कैसे रह पाती हूँ ...उसे खुद अपने आप पर हैरानी हो रही थी... अपने ही कमज़ोर वजूद से वह खुद से शर्मिन्दा हो रही थी....
 नहीं.....इस बार नहीं ...इस बार वह बिल्कुल कमज़ोर नहीं पड़ेगी.... इस बार बिल्कुल नहीं गिड़गिड़ाएगी...
फोन पर जब डॉ नीला ने बताया कि इस बार भी लड़की है तो पल भर के लिए उसका सिर घूम गया था...हाथ से रिसीवर छूट कर गिर गया....टीवी देखते देखते सास ने कनखियों से सुधा को देखा... फिर अपने बेटे की तरफ देखा... दोनो समझ गए थे कि डॉ नीला का ही फोन होगा...सास सुधा की ओर देखकर बेटे से कहती हैं... ‘लगता है कि फिर से मनहूस खबर आई है’
धीरज पूछते हैं... डॉ नीला ने रिपोर्ट के बारे में क्या बताया...चुप क्यों हो ....क्या हुआ....सुधा पीली पड़ गई थी..... धीमी आवाज़ में बस इतना ही कह पाई... “नहीं इस बार मैं क्लिनिक नहीं जाऊँगी...”
‘पता नहीं किस घड़ी मैं इस मनहूस को अपनी बहू बना कर लाई थी...एक पोते के लिए तरस गई...’ सास बोलती जा रही थी लेकिन सुधा के कानों में बस एक नन्हीं सी जान के सिसकने की आवाज़ आ रही थी... आँखें बन्द करके वहीं फोन के पास फर्श पर बैठ गई.....
एक बार फिर क्लिनिक चलने के लिए धीरज का आदेश...सास का चिल्लाना... सुधा पर किसी का कोई असर नहीं हो रहा था...कुछ सोच कर वह उठी....गालों पर बहते आँसुओं को पोंछा......उसने एक फैंसला ले लिया था....ज़िन्दगी को नए सिरे से शुरु करने का फैंसला... सुधा तैयार तो हुई थी...लेकिन क्लिनिक जाने के लिए नहीं..सदा के लिए उस घर को छोड़ने के लिए....
उसके हाथ में एक सूटकेस था..... धीरज को यकीन नहीं  हुआ...वह सपने में भी नहीं सोच सकता था कि सुधा ऐसा कोई कदम उठा पाएगी... वह उसे रोकना चाहता था लेकिन अपनी ही शर्तों पर...
आज सुधा कहाँ रुकने वाली थी....वह तेज़ कदमों के साथ घर की दहलीज पार कर गई.... अचानक मेनगेट पर पहुँच कर  रुकी... सूटकेस नीचे रख कर गले से मंगलसूत्र उतारा.......पति के हाथों में थमा कर फिर वापिस मुड़ी और बढ़ गई ज़िन्दगी की नई राह पर ....... राह नई थी लेकिन इरादे भी मजबूत थे... अब वह अकेली नहीं थी.. अजन्मी बेटी का प्यारा सा खूबसूरत एहसास उसके साथ था.....!  

32 comments:

Udan Tashtari said...

जाने कितनी सुधा कभी इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाती हैं....

rashmi ravija said...

बहुत ही सकारात्मक संदेश देती है ये कहानी....अब सारी सुधाओं को इस तरह के निर्णय लेने ही होंगे....शरीर उनका है....उसपर इस तरह के अत्याचार का हक़ किसी को नहीं है.

बहुत ही खूबसूरती से इस कथा...का ताना-बना बुना है...एक स्त्री का दर्द और उसके अंदर कि दृढ शक्ति दोनों परिलक्षित हुए हैं ,इस कहानी में.

Sunil Kumar said...

शत प्रतिशत सही बात कही है आपने सकारात्मक संदेश देती है ये कहानी.....

अरूण साथी said...

कहां ऐसा होता... यह सिर्फ कहानियों के लिए है। मैं अपने आस पास रोज रोज ऐसा होता देखता हूं पर कोई सुधा नहीं दिखती।

एक कड़वा सच यह भी है कि मां भी अब पति को बिना बताए ही जांच के लिए चली जाती है और गर्भपात करा कर घर आती है।

Mukesh Kumar Sinha said...

bilkul sach!!

निर्मला कपिला said...

अत्मविश्वास जगाती सार्थक लघु कथा। बधाई।

Bhavana said...

meenakhi ji badhai,
or arun ji aisi sudha to bahut hai, per jaisa ham dekhana chahte hai,dikhata hai, saath hi aisi sudha dikhane per ham unka ssath dene ke vajay hansi hi uadate hai, such ke saath hoge to jarur dikhegi

वन्दना said...

काश ऐसी हिम्मत हर नारी मे आ जाये तो आज बेटियों की कमी ना रहे और उन्हे बेमौत ना मरना पडे……………एक सार्थक सोच को दर्शाती कहानी दिल को छू गयी।

वाणी गीत said...

सच कहूं तो मैं भी अरुण जी से सहमत हूँ ...अपने आस पास मैंने भी ऐसी महिलाएं अधिक देखी हैं जो पति और सास की इच्छा के विरुद्ध स्वयं गर्भ परिक्षण कर गर्भपात करवाने की इच्छुक है ... मगर मैं ये मानती हूँ की कहीं न कहीं समाज में पुत्रियों और उनकी माँ के लिए एक उपेक्षा का भाव भी इसकी वजह बनता है ...और वे स्त्रियाँ भी इसी व्यवस्था का अंग बनती है ...

ऐसे में सुधा जैसी स्त्रियाँ ही समाज को नयी दिशा देने का साहस कर सकती हैं ...
अच्छी कहानी !

मीनाक्षी said...

कोई शक नहीं कि ऐसी अनगिनत औरतें हैं जो खुद ही अपने आने वाली नस्ल को मिटा देती हैं...सुधा जैसी सोच रखने वाले सच को समाज ही नकार देता है लेकिन फिर भी आशा का दामन तो पकड़े ही रहना होगा....एक भी ऐसी सोच को सच होते देख कर मन को राहत मिलती है...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर प्रेरणास्पद कहानी! बधाई!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सार्थक रचना के लिए बधाई स्‍वीकारें।

---------
समीरलाल की उड़नतश्‍तरी।
अंधविश्‍वास की शिकार महिलाऍं।

Dr Kiran Mishra said...

कई जनम के सत्कर्मो का जब मुझको परिणाम मिला
परमेश्वर से तब मैंने सीता सी बेटी मांग लिया सार्थक सन्देश
पहली बार आपके दर पर आयी हूँ
--

संजय भास्कर said...

सकारात्मक संदेश देती है ये कहानी....

Saba Akbar said...

सार्थक कहानी.. आज ऐसी ही सुधाओं की आवश्यकता है ...

Abhishek Ojha said...

अफ़सोस, ऐसी सुधाएं बहुत कम है !

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सुन्दर, आशावादी कथा. काश असल ज़िन्दगी में भी सुधाएं ऐसे ही मजबूत इरादे रख पातीं!!

Arvind Mishra said...

एक कठिन मगर अपरिहार्य निर्णय ...मुक्तिमार्ग !

शोभना चौरे said...

सुधा जैसी सोच ही परिवर्तन लाएगी और परिवर्तन की रह आसान तो नहीं होती पर हाँ असम्भव भी नहीं ?
मेरे घर me काम करने वाली बाई जिसका नाम गुँजा है ,उसका पति अपनी माँ का इकलोता बेटा है और जाहिर है उसकी सास को भी पोता पाने की तीव्र इच्छा है और इसी लालसा में ५ साल में तिन बेटिया हो ग ई |तीसरी बेटी के वक्त जाँच करवाई थी तो डाक्टर ने कहा था /लड़का है पर बेटी हुई |जब उसे चौथी बार उसे गर्भ की सम्भवना लगी तब उसने सास को बताया भी नही और गोली ले ली और बड़े आत्मविश्वास से कहा -अब चाहे बेटा हो या बेटी अगला बच्चा मुझे नहीं चाहिए मै अपनी तीनो लडकियों को ही अच्छी तरह से padhaungi aur पालूंगी |उसकी इस बात को मै हमेशा प्रोत्साहित करती हूँ और उससे यही आशा रखती हूँ की वः अपने इस निर्णय पर अडिग रहे |इसमें सकारात्मक पक्ष यह है ही उसका पति उसके साथ है |

सुनीता शानू said...

अगर हर औरत सुधा की तरह हिम्मत कर ले तो सारी समस्या ही खत्म हो जायें। आपने बिलकुल सही और सत्य को उजागर करती कहानी लिखी है दी।
सादर

सदा said...

बहुत ही सार्थक प्रस्‍तुति ।

S.M.HABIB said...

"भ्रूण लिंग परिक्षण" कानूनी तौर पर पूर्णतया अवैधानिक होने पर भी अनेक क्लिनिक पैसे के लिए गुपचुप तरीके से यह कार्य करते हैं और वे भी उतने ही अपराधी हैं बल्कि कहें की उनसे ज्यादा, जो परिक्षण कराना चाहते हैं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. भ्रूण हत्या रोकने में चिकित्सक और अस्पताल निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं...
समाज में यद्यपि कुछ जागरूकता तो दिखाई पड़ती है, तथापि बहुतों का जागना अभी शेष है...
बहरहाल, एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय पर ऐसी संवेदनशील लेखन को दिल से सलाम...
सादर....

रेखा श्रीवास्तव said...

एक सार्थक सोच को बल देती हुई कहानी, अब सुधा की ही जरूरत है - धीरज जैसे लोगों के साथ जीने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है जहाँ अपने ही अंश के लिए को संवेदनाएं ही न हो तो फिर भविष्य के बारे में एक प्रश्न-चिह्नलग जाना स्वाभाविक ही है.

रेखा said...

आज भी हमारे देश की बहुत सारी सुधा ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर होती हैं ......एक सकारात्मक सोच के साथ सार्थक सन्देश

अनामिका की सदायें ...... said...

aaj is samaj ko sudha jaisi naariyon ki jarurat hai.

bahut acchha sandesh deta lekh.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी यह कहानी पढ़ कर गयी थी ..उस समय प्रतिक्रिया देने का वक्त नहीं मिला था ...

आपने इसके माध्यम से नारी को अपनी सोच और उसे पूरा करने की हिम्मत पैदा करने का सन्देश दिया है ...प्रेरक कहानी

Maheshwari kaneri said...

सकारात्मक संदेश देती है ये कहानी.....

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

ब्लॉग बुलेटिन का शुक्रिया कि आप की इस पोस्ट तक आ पहुंचा।

जैसा अंत आपने दर्शाया है अगर वास्तव मे ऐसा होने लगे तो तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी।

काश यह हिम्मत सब मे आए।

सादर

***Punam*** said...

एक ऐसी कहानी जो न जाने कितनी सुधाओं की सच्चाई है...आज भी आवाज कहीं दबी रह जाती है या इसका एहसास काफी बाद में होता है ...उन बहनों को नमन है जो पहली बार में ही इसके खिलाफ आवाज़ उठा देती हैं....!! ऐसी प्रेरणादायक कहानी सभी को पदनी चाहिए....अगर किसी एक की भी सोच में परिवर्तन आया तो या कहानी सार्थक हुई समझिये......!!

आपको ढेरों शुभकामनाएं.....

Kailash Sharma said...

बहुत प्रेरणाप्रद प्रस्तुति...अगर पुरुष इतने कमजोर हैं साथ देने में तो स्त्रियों को स्वयं यह कठोर कदम उठाना ही होगा..

निवेदिता said...

दिल को छू गई ...........

Roshi said...

काश सुधा जैसी हिम्मत हर अबला में आ जाये .?..............