Thursday, January 29, 2009

आपकी अभिव्यक्ति पर मेरे भाव

दूर दूर तक गहराते कोहरे में अपने वजूद को गुम होते देख कर स्तब्ध रह जाना और फिर उसी वजूद की तलाश में निकल जाना .... बस ऐसे ही दिन पर दिन , हफ्ते दर हफ्ते और महीनों निकल गए....

कोहरा, कलम और मैं जब एक जुट हुए तो शब्दों को एक नया आकार मिलने लगा जिसे आप सब ने निहारा और तारीफ में कुछ और शब्द जोड़ दिए...

जिन्दगी की उहा पोह, उलझनें और जिम्मेदारियाँ अक्सर ऐसी ही मानसिक स्थितियाँ निर्मित कर देती हैं, जिन्हें आपने इतनी सुन्दरता से शब्द दिये हैं. मनोभावों की सशक्त एवं सहज अभिव्यक्ति. – उड़न तश्तरी
समीरजी, आपने सही पहचाना... खानाबदोश सी ज़िन्दगी कब थोड़ा ठहरेगी.बस इसी इंतज़ार में लिखना पढ़ना छोड़ बैठे.....जल्दी ही अपनी खानाबदोश ज़िन्दगी के कुछ अनुभव लिखूँगी.

कलम की जय हो! - अनूप शुक्ल
अनूप जी , कलम में सर कलम करने की ताकत भी है और समाज को बदलने का कमाल भी कलम ही कर सकती है. तभी तो उसकी जय जयकार होती है.

कीबोर्ड पर ऊंगलियों के
थिरकने से निकलते
नये तराने हैं – अविनाश वाचस्पति


सोलह आने सच है आपकी बात... कीबोर्ड पर उंगलियों के थिरकने से
तराने नए निकलते हैं जो दिल और दिमाग को तरोताज़ा कर देते हैं.

Fog Is A Tunnel
Life Is A Train
At The End Of The Tunnel
There Is Light Always
Keep The Train Of Life
Chugging On - रचनाजी


रचना जी, सच कहूँ तो इस घने कुहासे में सिर्फ और सिर्फ अपने होने का एहसास होता है.... दूर दूर तक बस मैं और गहरा कोहरा... कभी कभी उससे बाहर निकलने का मन ही नहीं करता...

आपकी आमद हमेशा सुखद रहती है....इस कलम को छोडियेगा नही....ये कई दर्द से मुक्ति दिलाती है - डा. अनुराग

डा. अनुराग , कलम को छोड़ने का सोच भी नहीं सकते , हाँ कभी दर्द हद से ज़्यादा बढ़ जाता है तो उंगलियाँ सुन्न सी हो जाती हैं.... और कलम हाथ से छूट जाती है....

हमारी भी दशा कोहरामय है। बस आप कलम की बात कर रही हैं - मैं रेलगाडी की! – ज्ञानदत्त जी

ज्ञानजी, इसमें कोई शक नहीं कि हम सब के जीवन में कोहरामय कोहराम मचा है...

बहुत दिनों बाद आज आप दिखी है ।
मीनाक्षी परेशान न हो ये दौर गुजर जायेगा ।
ऐसा हम इसलिए कह रहे है क्यों की हम इस दौर से गुजर चुके है (sep -jan )जब कुछ भी लिखने का मन नही करता था । -- ममता जी


ममताजी, कभी कभी इस दौर से गुज़रने का अपना एक अलग ही अनुभव होता है। मौका पाते ही आपसे ज़रूर बाँटूगी।

हिन्दी ब्लोग जगत मेँ तशरीफ रखिये स्वागतम ~~~ Where have you been ? :)- लावण्या


लावण्यादी, घने कोहरे के घेरे से घिरी मैं... नहीं जानती कैसे मुक्त हो पाऊँ मैं... कोशिश एक आशा जान बस उस किरण का इंतज़ार करूँ मैं....

जिस ब्लॉग जगत में कलम और उससे जन्मे शब्दों की परवरिश होती है , चाह कर भी उस दिशा में बढ़ते कदम अनायास रुक जाते हैं और मन बेचैन हो उठता है. शब्दों के भाव विपरीत दिशा में चलने की चाहत पैदा कर देते हैं...तो कभी जीवन धारा सब बाँध तोड़ कर बह जाने को मचल उठती है ...


आप सबकी कलम से जन्मे शब्दों और उनके भावों ने मेरी कलम को एक नई उर्जा दी है, आप सबका आभार... यही उर्जा अजन्मे शब्दों को एक नया और सुन्दर रूप देगी जिसे आप जल्द ही देख पाएँगे.

7 comments:

dr. ashok priyaranjan said...

भाव और विचार के श्रेष्ठ समन्वय से अभिव्यक्ति प्रखर हो गई है । विषय का विवेचन अच्छा किया है । भाषिक पक्ष भी बेहतर है । बहुत अच्छा लिखा है आपने ।
मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-आत्मविश्वास के सहारे जीतें जिंदगी की जंग-समय हो तो पढें और कमेंट भी दें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

संगीता पुरी said...

बहुत तकलीफ हुई आपके दर्द को जानकर....इंतजार का फल सबको मिलता है... जल्‍द ही किरण दिखाई देगी।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

अरे वहाँ इतना घना कोहरा है और हमारे यहाँ बर्फ का साम्राज्य है (आकर देख लीजिये ) ( on my Blog )..
" साथी रे हीम्मत ना हार ..
आशा की पतवार ले हाथ ,
कर जा जीवन सागर को पार "
स्नेह,
- लावण्या

Udan Tashtari said...

बस!! इसी सकारात्मक एवं आशावादी सोच की आपसे उम्मीद थी-इस तरह से कुहरा तो क्या, कोई भी आपका रास्ता नहीं रोक पायेगा.

हम आपका इन्तजार करेंगे-शुभकामनाऐं.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

आपका यहाँ इन्तजार रहेगा ..

डॉ .अनुराग said...

बस लिखती रहिये.......ओर बांटती रहिये ...

ramadwivedi said...

मीनाक्षी जी, ज़िन्दगी में न जाने कितनी बार ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती हैं जब ऐसा लगता है जीवन व्यर्थ हो रहा है लेकिन हर रात के बाद सुबह आती है इसलिये निराश मत हों जल्दी ही कोहरा छँट जाएगा और आपकी कलम और प्रखर- मुखर हो जाएगी। बस हौसला रखिए ।हमारी हार्दिक शुभकामनाएं आपके साथ हैं....सस्नेह..

डा.रमा द्विवेदी