Friday, February 22, 2008

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5 comments:

नीरज गोस्वामी said...

मिनाक्षी जी
आज आप की नई पुरानी सब पोस्ट पढ़ डालीं.आप का घर भी देखा और आपकी पारखी नज़र की तारीफ भी कर डाली.हर किसी को साधारण से काठ के टुकडों में शिल्प नज़र नहीं आता. इस बार आप के मुम्बई आगमन के दौरान मेरे जयपुर घर जाने की वजह से मुलाकात नहीं हो पायी उम्मीद करता हूँ की भविष्य में ये सम्भव हो. बेटा अब कैसा है बताएं और क्या दुबारा उसे दिखाने आप को मुम्बई आना होगा?
आप मेरे ब्लॉग पर आयीं ग़ज़ल पढी इसके लिए तहे दिल से शुक्रिया. जब कोई संवेदन शील व्यक्ति प्रशंशा करता है तो जो खुशी मिलती है लिखने में वो शब्दों में बताई नहीं जा सकती.
खुश रहें
नीरज

रवीन्द्र प्रभात said...

गोस्वामी जी की तरह मेरा भी आभार स्वीकार करें -आप मेरे ब्लॉग पर आयीं ग़ज़ल पढी इसके लिए तहे दिल से शुक्रिया.

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