Friday, January 11, 2008

तू सूरज मैं मूरत मोम की



तू सूरज मैं मूरत हूँ मोम की
तू अग्निकण मैं बूँद हूँ ओस की !
तपन तेरी से पिघले तन-मन
तपिश तेरी से सुलगे प्रति-क्षण !
तू समझे न बातें मेरे ह्रदय की
तू क्या जाने पीड़ा मेरे मन की !
अभिव्यक्त करूँ मैं कैसे अपने भावों को
हँसते-हँसते सहती हूँ तेरी घातों को !

11 comments:

Dard Hindustani (पंकज अवधिया) said...

सशक्त अभिव्यक्ति। फुरसतिया जी जैसे दिग्गजो की नजर नही पडी। नही तो वे आपको पुस्तक प्रकाशन का सुझाव जरूर देते।

Gyandutt Pandey said...

बस यह हंसते हंसते घात सहने से ही अभिव्यक्ति मंजती है।

mehek said...

tu suraj,main murat mom ki,sundar,bhav meenakshiji,aise hi to hota hai,koi apne bhav keh nahi pata,aur bas sehta jata hai andar man mein.this is beautiful.

mamta said...

कम शब्दों मे सब कुछ कह दिया आपने।
कमाल की पंक्तियाँ है।

Sanjeet Tripathi said...

इतनी गंभीर मन: स्थिति, क्या बात है!!

बाल किशन said...

सरल शब्दों मे गहरी बात जैसे गागर मे सागर.
बहुत अच्छी कविता.
बधाई.

छत्‍तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

उपर जो भाईयों नें कहा है उसे ही हमारी टिप्‍पणी माने । कविता का मजा तो चंद शव्‍दों में महाकाव्‍य को समेट लेने पर ही आता है ।

संजीव

त्रिलोचन : किवदन्ती पुरूष

Parul said...

sundar bhaav DI...

Poonam Agrawal said...

Haste-haste sahtee hu tere ghaaton ko.....
Teree khushee ke vaste na jane kyaa kyaa sahaa ,
har mod jindgee kaa hum khushee se jee liye.
Muje ye lines yaad aa gayee.
Very well said.Likhtee rahiye....

संजय भास्कर said...

कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

अनूप शुक्ल said...

बहुत खूब! आपको सच में किताब छपवानी चाहिये। :)