Saturday, January 5, 2008

मेरे त्रिपदम (हाइकु)



प्रेम सत्य है
रूप रंग सुगन्ध
त्रिपदम सा

निशा स्तब्ध थी
सागर सम्मोहित
लहरें गातीं

धरा ठिठकी
लहरों में उद्वेग
चंदा निहारे

सुर कन्या सी
आलिंगनबद्ध थीं
लहरें प्यारी

रेतीला मन
फिसलते कदम
दिशाहीनता


शीत बसंती
बदलती ऋतुएँ
झरता ताप


संघर्षरत जीते
जाएँ जीवन
आत्मा की शक्ति


गरजे मेघ
दामिनी दमकती
सूरज भागा

15 comments:

पर्यानाद said...

कितना संघर्ष कर सकता है कोई? आप ही ने कहा कि रेतीले मन के फिसलते कदम दिशाहीन कर देते हैं.... त्रिपदम् दोबारा पढ़ कर अच्‍छा लगा.

Dard Hindustani (पंकज अवधिया) said...

त्रिपदम शब्द की रचना करने वाले से त्रिपदम सुनना अनोखा अनुभव है। इस साल आप नियमित रूप से त्रिपदम लिखिये।

आपने लिखा है 'सूरज भागा'। आप ही ने तो फोटो दिखाया था जिसमे सुबह-सुबह आपके बालक ने उसे पकड रखा था। इसी डर से वह भाग गया होगा। :)

parul k said...

शीत बसंती
बदलती ऋतुएँ
झरता ताप
sundar DII,kuch din me yahan bhi mausam badal jaayega...basant to aaney hi vala hai

mehek said...

prem satya hai tripadam sa,aur lehro par ke haiku behad pasand aaye.

aap ek behtarin kaviyatri hai,apki sari kavita hame acchhi lagti hai,specialy haiku,suraj pakde wala aur kate vriksh wala bhi.

sagar ki tariff ek bundh kaise kare,par apka hruday bhi sagar sa vishal hai.

tariff mein kuch upar niche hua ho tho maaf kigiye ga.

छत्‍तीसगढिया said...

आपके त्रिपदम विधा का प्रयोग अनोखा है, इसे समृद्ध बनाईये, मुझे इसका भविष्‍य उज्‍वल नजर आता है ।

संजीव

छत्‍तीसगढ के शक्तिपीठ – 2

Atul said...

achhee kavita hai ,Badhaee 1

Sanjeet Tripathi said...

क्या बात है!
बढ़िया हैं।

Gyandutt Pandey said...

वाह! हम भी बना दें त्रिपद!

हायकू

सुने कौन

कहने वाले हैं सब।

दीपक भारतदीप said...

उत्कृष्ट कविता और चित्र
दीपक भारतदीप

Manish said...

अच्छा लिखा है..

मीनाक्षी said...

त्रिपदम (हाइकु) विधा मुझे भाती है लेकिन आप सब को भी अच्छी लगी , बहुत बहुत धन्यवाद..वैसे बहुत कम लोगो को ही भाती है.

अजित वडनेरकर said...

रेतीला मन
फिसलते कदम
दिशाहीनता

अच्छी पंक्तियां.....

रंजू said...

शीत बसंती
बदलती ऋतुएँ
झरता ताप

बहुत बहुत सुंदर लगी सब लिखती रहे ,दिल को छूती हैं यह

मृत्युंजय कुमार said...

दृष्टि सुंदर
सधी हुई
प्रत्यंचा पर
चढ़ी हुई।
रेतीला मन
भले ही फिसले
पर
नहीं रुकेगी
कलकल धारा
तट से टकराकर
बड़ी हुई।

सागर नाहर said...

बड़े दिनों बाद हाईकू पढ़ने को मिले.. मुझे कविता की यह विधा ही ज्यादा पसन्द है। कम शब्दों में गहरी बात।
बहुत बढ़िया।