Monday, January 21, 2008

सूखे कगार का प्रथम मिलन





आज मेरा व्याकुल मन फिर मिलने को आतुर
बरसों पुराना मधुर-प्रेम रस फिर पीने को आतुर !!

सूखे कगार सी पतली दो रेखाएँ
बेचैन भुजाएँ बनकर आलिंगन करना चाहें !!

सूखे अधरों का कंपन बढ़ता ही जाए
फिर भी प्यास प्रेम की बुझ न पाए !!

आज मेरा व्याकुल मन फिर मिलने को आतुर
बरसों पुराना मधुर-प्रेम रस फिर पीने को आतुर !!

प्रथम मिलन को भूल न पाऊँ
मोहपाश में फिर-फिर बँधती जाऊँ !!

प्यासे अधरों की, चंचल नैनों की
भाषा प्रेम की फिर से पढ़ना चाहूँ !!

आज मेरा व्याकुल मन फिर मिलने को आतुर
बरसों पुराना मधुर-प्रेम रस फिर पीने को आतुर !!

9 comments:

Sanjay said...

बदला हुआ ये अंदाज !!!!!

mehek said...

mohpash mein bandh bandh jao,phela milan bhul na pau,sundar panktiya,kuch gulabi lamhe yaad aaye huma bhi:).so what if they r just memories now,but beautiful ones isnt it.soemtimes great to linger in old thoguhts to.

पंकज सुबीर said...

अच्‍छा है मीनाक्षी जी ये प्रयोग भी इन दिनों आप कक्षाओं में नज1र नहीं आ रहीं हैं । आपके बालक को लेकर जो समस्‍या थी आशा है वो अब ठीक होगी । शुभकामनाएं

mamta said...

सुन्दर कविता !

Sanjeet Tripathi said...

क्या बात है, भारत आने की आतुरता झलक रही है।

ajay kumar jha said...

meenakshee jee,
saadar abhivaadan. kyaa baat hai aaj to aapkee lekhanee mein ek nayaa rang dekhne ko mil gayaa. is sheet ritu mein vasant kee khushboo failaa dee apne to . achha nahin bahut achha lagaa.

Mrs. Asha Joglekar said...

अच्छा लगा आपका ये नया रंग । किसी आतुर नवेली की सी भावनाएँ छलक रहीं हैं।

sunita (shanoo) said...

बिलकुल अलग..मगर बहुत खूबसूरत...अच्छा तो आप कब आ रही है भारत...और हाँ भारत में कहाँ? भारत के दिल यानी की दिल्ली या....:)

संजय भास्कर said...

... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।