Thursday, November 29, 2007

विछोह का दर्द और उसका उपाय

अभी अभी टी.वी. पर सदा के लिए बिछुड़े अपने बेटे के लिए शेखर सुमन जी की आँखें नम होते देखीं, इसी के साथ याद आया नीरज जी और 21 वर्षीय दीपक जो आशुतोष 'मासूम' के छोटे भाई हैं, उनका असमय इस दुनिया से विदा हो जाना.
जो इस दुनिया से चले जाते हैं उनके लिए शायद मृत्यु नव जीवन पाने का प्रकाशपुंज सा है लेकिन मृत्यु अंधकार से भरा कोई शून्य-लोक उनके लिए बन जाता है जो पीछे रह जाते हैं.
हम अपने प्रियजनों को सदा के लिए खोकर गहरी पीड़ा के अन्धकार में डूब जाते हैं. मुझे आज भी याद आता है पापा का हमें छोड़ कर चले जाना ऐसा दर्द दे गया था जो एक पल भी सहन नहीं होता था. अपने देश से दूर , अपनों से दूर उस दर्द को सहने का एकमात्र उपाय मिला अंतर्जाल पर एक लिंक जिसे पढकर या उसमें कुछ संगीतमय वीडियो देखकर मन शांत होता.
सोचा कि आपसे दिल मे उठे दर्द को दूर करने का उपाय बाँटा जाए.

http://www.selfhealingexpressions.com/goddess_meditation.html
( नारी किसी भी रूप में आने वाले कष्टों को दूर करने में सहायक होती है)

http://www.selfhealingexpressions.com/starshine.html
(विस्तृत आकाश में अनगिनत तारों को देखकर मन अजीब सी शांति पाता है)

http://www.selfhealingexpressions.com/earth_meditation.html
(प्रकृति के साथ जुड़ने पर भी शांति और शक्ति मिलती है )

Tuesday, November 27, 2007

सब बेबस हैं !

हम सब बेबस हैं। अपने ही गणतंत्र में लाचार। कुछ बेबस हैं वहशीपन की हद तक चले जाने को , कुछ बेबस हैं बस जड़ से होकर देखते रह जाने को ---

मैंने देखा इंसानों के इस जंगल में
शिकार करें सब दिन के सूरज में !

मैंने देखा इंसानों के भूखे चेहरों को
खून के प्यासे सूखे सूखे अधरों को !

मैंने देखा लोगों के वहशीपन को
पलभर में वे भूलें अपनेपन को !

मैंने देखा होते बैगाना सबको पल में
समझ न आए घृणा-घृणा जब फैले सब में !

मैंने देखा अन्दर कुछ है बाहर कुछ है
अन्दर बाहर एक नहीं सौ दुख ही दुख हैं !

Monday, November 26, 2007

नारी मन के कुछ कहे , कुछ अनकहे भाव !



मानव के दिल और दिमाग में हर पल हज़ारों विचार उमड़ते घुमड़ते रहते हैं. आज कुछ ऐसा ही मेरे साथ हो रहा है. पिछले कुछ दिनों से स्त्री-पुरुष से जुड़े विषयों को पढकर सोचने पर विवश हो गई कि कैसे भूल जाऊँ कि मेरी पहली किलकारी सुनकर मेरे बाबा की आँखों में एक चमक आ गई थी और प्यार से मुझे अपनी बाँहों में भर लिया था. माँ को प्यार से देख कर मन ही मन शुक्रिया कहा था. दादी के दुखी होने को नज़रअन्दाज़ किया था.
कुछ वर्षों बाद दो बहनों का एक नन्हा सा भाई भी आ गया. वंश चलाने वाला बेटा मानकर नहीं बल्कि स्त्री पुरुष मानव के दोनों रूप पाकर परिवार पूरा हो गया. वास्तव में पुरुष की सरंचना अलग ही नहीं होती, अनोखी भी होती है. इसका सबूत मुझसे 11 साल छोटा मेरा भाई था जो अपनी 20 साल की बहन के लिए सुरक्षा कवच बन कर खड़ा होता तो मुझे हँसी आ जाती. छोटा सा भाई जो बहन की गोद में बड़ा होता है, पुरुष-सुलभ (स्त्री सुलभ के विपरीत शब्द का प्रयोग ) गुणों के कारण अधिकार और कर्तव्य दोनों के वशीभूत रक्षा का बीड़ा उठा लेता है.
फिर जीवन का रुख एक अंजान नई दिशा की ओर मुड़ जाता है जहाँ नए रिश्तों के साथ जीवन का सफर शुरु होता है. पुरुष मित्र, सहकर्मी और कभी अनाम रिश्तों के साथ स्त्री के जीवन में आते हैं. दोनों में एक चुम्बकीय आकर्षण होता है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता.
फिर एक अंजान पुरुष धर्म का पति बनकर जीवन में आता है. जीवन का सफर शुरु होता है दोनों के सहयोग से. दोनों करीब आते हैं, तन और मन एकाकार होते हैं तो अनुभव होता है कि दोनों ही सृष्टि की रचना में बराबर के भागीदार हैं. यहाँ कम ज़्यादा का प्रश्न ही नहीं उठता. दोनों अपने आप में पूर्ण हैं और एक दूसरे के पूरक हैं. एक के अधिकार और कर्तव्य दूसरे के अधिकार और कर्तव्य से अलग हैं , बस इतना ही.
अक्सर स्त्री-पुरुष के अधिकार और कर्तव्य आपस में टकराते हैं तब वहाँ शोर होने लगता है. इस शोर में समझ नहीं पाते कि हम चाहते क्या हैं? पुरुष समझ नहीं पाता कि समान अधिकार की बात स्त्री किस स्तर पर कर रही है और आहत स्त्री की चीख उसी के अन्दर दब कर रह जाती है. कभी कभी ऐसा तब भी होता है जब हम अहम भाव में लिप्त अपने आप को ही प्राथमिकता देने लगते हैं. पुरुष दम्भ में अपनी शारीरिक सरंचना का दुरुपयोग करने लगता है और स्त्री अहम के वशीभूत होकर अपने आपको किसी भी रूप में पुरुष के आगे कम नहीं समझती.
अहम को चोट लगी नहीं कि हम बिना सोचे-समझे एक-दूसरे को गहरी चोट देने निकल पड़ते हैं. हर दिन नए-नए उपाय सोचने लगते हैं कि किस प्रकार एक दूसरे को नीचा दिखाया जाए. यह तभी होता है जब हम किसी न किसी रूप में अपने चोट खाए अहम को संतुष्ट करना चाहते हैं. अन्यथा यह सोचा भी नहीं जा सकता क्यों कि स्त्री और पुरुष के अलग अलग रूप कहीं न कहीं किसी रूप में एक दूसरे से जुड़े होते हैं.
शादी के दो दिन पहले माँ ने रसोईघर में बुलाया था. कहा कि हाथ में अंजुलि भर पानी लेकर आऊँ. खड़ी खड़ी देख रही थी कि माँ तो चुपचाप काम में लगी है और मैं खुले हाथ में पानी लेकर खड़ी हूँ. धीरज से चुपचाप खड़ी रही..कुछ देर बाद मेरी तरफ देखकर माँ ने कहा कि पानी को मुट्ठी में बन्द कर लूँ.
मैं माँ की ओर देखने लगी. एक बार फिर सोच रही थी कि चुपचाप कहा मान लूँ या सोच समझ कर कदम उठाऊँ. अब मैं छोटी बच्ची नहीं थी. दो दिन में शादी होने वाली है सो धीरज धर कर धीरे से बोल उठी, 'माँ, अगर मैंने मुट्ठी बन्द कर ली तो पानी तो हाथ से निकल जाएगा.'
माँ ने मेरी ओर देखा और मुस्कराकर बोली, "देखो बेबी , कब से तुम खुली हथेली में पानी लेकर खड़ी हो लेकिन गिरा नहीं, अगर मुट्ठी बन्द कर लेती तो ज़ाहिर है कि बह जाता. बस तो समझ लो कि दो दिन बाद तुम अंजान आदमी के साथ जीवन भर के लिए बन्धने वाली हो. इस रिश्ते को खुली हथेली में पानी की तरह रखना, छलकने न देना और न मुट्ठी में बन्द करना." खुली हवा में साँस लेने देना ...और खुद भी लेना.
अब परिवार में तीन पुरुष हैं और एक स्त्री जो पत्नी और माँ के रूप में उनके साथ रह रही है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं, न ही उसे समानता के अधिकार के लिए लड़ना पड़ता है. पुरुष समझते हैं कि जो काम स्त्री कर सकती है, उनके लिए कर पाना असम्भव है. दूसरी ओर स्त्री को अपने अधिकार क्षेत्र का भली-भांति ज्ञान है. परिवार के शासन तंत्र में सभी बराबर के भागीदार हैं.

http://es.youtube.com/watch?v=CRr9eubXo68&feature=related

http://es.youtube.com/watch?v=e5n78sw8t9Q&feature=related

(ईरानी फिल्म 'मिम मिसले मॉदर' के छोटे छोटे दो क्लिपस हैं जो मुझे बहुत अच्छे लगे. यहाँ भाषा नहीं लेकिन भाव आप ज़रूर अनुभव कर पाएँगें.)

Saturday, November 24, 2007

हे प्राण, मेरे आँखें खोलो !

हे प्राण, मेरे आँखें खोलो
सृष्टि को रूप नया दे दो !

कब तक निश्चल पड़े पड़े
देखोगे कब तक खड़े खड़े !
हे प्राण .....................

उठो उठो हे सोए प्राण
आँखें मूँदे रहो न प्राण !
हे प्राण .................

मानवता का संहार है होता
वसुधा मन पीड़ा से रोता !
हे प्राण ....................

कृतिकार के मन का रुदन सुनो
विश्व की करुण पुकार सुनो !
हे प्राण .....................

हे प्राण, मेरे आँखें खोलो
सृष्टि को रूप नया दे दो !!

Friday, November 23, 2007

व्यक्तित्त्व














सामने से उसे आते देख मैं चौंक गई
सुन्दर, सौम्य, मुस्काती नम्र नम आँखें
चाल में शालीनता, चेहरे पर नहीं मलिनता

किसी ने कहा - "देखते ही पता चलता है
वह घमण्डी है, नकचढ़ी है!"

किसी ने कहा - " नहीं नहीं , वह गूँगी है,
उसे बोलना ही नहीं आता है !"

किसी ने कहा - "कछुए की तरह सदा अपने
कवच में छिपी रहती है !"

किसी ने कहा - "हीन भावना से ग्रस्त शायद
निर्धन घर की लड़की है !"

किसी ने कहा - "बन्द किताब का वह एक
कोरा पन्ना है !"

लेकिन

किसी ने नहीं कहा था - "वह भावुक संवेदनशील
ह्रदय वाली है !"

किसी ने नहीं कहा था - "उसका मन शीशे जैसा
बेहद नाज़ुक है !"

किसी ने नहीं कहा था - "वह मानव के छल-कपट
से आहत है!"

किसी ने नहीं कहा था - " वह प्रेम रस पीने को
व्याकुल है!"

सामने से उसे आते देख मैं समझ गई !
इन आँखों को पढ़ना बहुत मुश्किल है !
पढ़ लिया तो फिर समझना मुश्किल है !
समझ लिया तो फिर भूलना मुश्किल है !

Wednesday, November 21, 2007

मृत्यु का स्वागत करता 46 साल का प्रोफेसर(Dying Professor's Last Lecture)

मुत्यु को इतने प्यार से मुस्करा कर कोई गले लगा सकता है इसका जीता जागता उदाहरण अमेरिका के कॉलेज का कम्पयूटर साइंस का प्रोफेसर 46 वर्षीय रैण्डी पॉश. जिन्हें कैंसर है और कुछ ही महीनों के मेहमान हैं. दस किश्तों में उन्होंने जो लास्ट लैक्चर दिया है उनमें ज़िन्दगी को ज़िन्दादिली से जीने की मह्त्त्वपूर्ण बातें छिपी हैं.
प्रो. रैण्डी ने लैक्चर शुरु करने से पहले दण्ड बैठक लगा कर सबको यह कहना चाहा कि अगर कोई मेरी तरह दण्ड बैठक लगा सकता है तभी सहानुभूति दिखाने की कोशिश करे.
बड़ी सरलता से उन्होंने कहा कि यह आखिरी लैक्चर उनके बच्चों के लिए है जो अभी छोटे हैं लेकिन बड़े होकर अपने पिता को अच्छी तरह समझ सकेंगे.
अपनी पत्नी को जन्मदिन की बधाई देते हुए खुद मुस्कराते हुए सभी को रुला दिया. आँसू पोंछती हुई पत्नी एक मोम बत्ती को बुझा कर पति के गले लग कर रो पड़ी.
अपने बचपन को याद करके आज के माता-पिता को सन्देश देते हुए कहा कि बच्चों को कभी कभी उनकी इच्छानुसार कुछ काम करने की इजाज़त दे देनी चाहिए. उन्होंने अपने कमरे की दीवारों को दिखाया जहाँ उन्होंने गणित की कुटेशंज़ लिखी हुई थीं.
कम्पयूटर आर्टस और 'वर्चुयल रीयल्टी' को लेकर उन्होंने कॉलेज में काफी नाम कमाया.
सभी सहकर्मी जो भी मंच पर बोलने आ रहे थे , सबके गले रुँधे हुए लेकिन होंठो पर मुस्कान और आँखें नम थी. बीच बीच में आँखें नम होती रहीं लेकिन अपने आप को रोक न सकी और एक के बाद एक सभी किश्तों को एक बार में देख कर ही उठी.

आशा है आप भी देखना पसन्द करेंगे.

http://www.youtube.com/watch?v=_8kUTUIveyA

(यूट्यूब के पेज़ को खोलने पर दाईं तरफ दस किश्तें भी देखी जा सकती हैं)

http://www.cs.cmu.edu/~pausch/news/index.html

(इस पेज पर प्रो. रैण्डी पॉश के बारे में पढा भी जा सकता है.)

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी ने कविता को 'कल्पना के कानन की रानी' कहा है.

स्वाधीनता आन्दोलन के सन 1920 के बाद के दौर में नई पीढ़ी का यह नवीनता के प्रति मुग्ध आकर्षण अपने में अनेक पहलुओं को समेटे था जैसे कल्पनाशीलता, स्वच्छंदता, पुरातन के विरुद्ध संघर्ष, नए समाज का स्वप्न और स्वाधीन भारत के नवप्रभात की अभिलाषा.
निराला जी ने 'परिमल' की भूमिका मे कहा है, "हिन्दी उद्यान में अभी प्रभात काल ही की स्वर्णछटा फैली है. उसमें सोने के तारों का बुना कल्पना का जाल ही अभी है, जिससे किशोर कवियों ने अनंत विस्तृत नील प्रकृति को प्रतिमा में बाँधने की चेष्टाएँ की हैं, उसे प्रभात के विविध वर्णों से चमकती हुई अनेक रूपों में सुन्दर देखकर . वे हिन्दी के एक काल के शुष्क साहित्य ह्रदयों में इन मनोहर प्रतिमाओं को प्रतिष्ठित करने का विचार कर रहे हैं. इसलिए अभी जागरण के मनोहर चित्र, आह्लाद परिचय आदि जीवन के प्राथमिक चिह्न ही देख पड़ते हैं, विहंगों का मधुर कल कूजन, स्वास्थ्यप्रद स्पर्श सुखकर शीतल वायु, दूर तक फैलई हुई प्रकृति के ह्रदय की हरेयाली, अनंतवाहिनी नदियों का प्रणय-चंचल वक्ष:स्थल, लहरो पर कामनाओं की उज्ज्वल किरणें, चारों ओर बाल-प्रकृति की सुकुमार चपल दृष्टि."
राष्ट्रीयता स्वाधीनता आन्दोलन की जो तरंग 1920 के बाद शुरु होती है , उसी नव जागृति की पृष्ठभूमि में छायावादी कविताएँ लिखी जा रही थीं. पंत जी की 'पल्लव' और निराला जी के मुक्त छंद शीघ्र ही लोकप्रिय हो गए. प्रसाद जी के नाटको के गीत अपनी गेयता के कारण प्रसिद्ध हुए. छायावाद के समय भाषा ने जो रूप धारण किया, उसी का यह परिणाम हुआ कि खड़ी बोली में भी कविता कविता सी लगने लगी.
फिर समय बदला, प्रगति के पथ पर कविता आगे बढ़ी, नए नए प्रयोग करती हुई कविता को बदलते समय ने एक नए रूप में हमारे सामने ला खड़ा किया. आधुनिक नारी सी नई संवेदना और शिल्प के साथ नई कविता का रूप ही अलग है. अगर इस विषय पर चर्चा शुरु की तो बस आप मुझे ब्लॉग निकाला ही दे देंगे.

अब आप लेख पढने आ ही गए हैं तो इस कविता पर ही एक नज़र डाल कर एक शीर्षक भी देते जाइए :)

हरे भरे तेरे तृण ऐसे
रोम-रोम पुलकित हों जैसे
स्नेहिल सदा स्पर्श क्यों तेरा?
रीता फिर भी मन क्यों मेरा ?

कोमलाँगी तुम प्यारी-प्यारी
मनमोहिनी न्यारी-न्यारी
क्यों काँटे सी चुभती हो?
क्यों रूखी सी दिखती हो?

धानी आँचल से ढकी हुई
पलकें तेरी हैं झुकीं हुईं
पलक उठाई क्यों तुमने ?
नज़र मिलाई क्यों तुमने?

कहती हो अपनी यदा-कदा
रहती हो तुम मौन सदा
आवाज़ उठाई क्यों तुमने ?
भाव दिखाए क्यों तुमने ?

Monday, November 19, 2007

छायावाद की सबसे बड़ी देन- एक समय में कर्कश समझे जाने वाली खड़ी बोली गलकर मोम हो गई. "दिनकर जी'


हिन्दी में एम.ए करते समय मेरा प्रमुख विषय छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद और उनका काव्य था. छायावाद पढ़ते पढ़ते उसकी छाया का आवरण अपने ऊपर सदैव पाती हूँ जैसे आकाश में उमड़ते घुमड़ते बादलों का आँचल सर पर हो या मखमली हरी नरम सी दूब का दामन जो सागर से उठती भाप सी साँसों से जलने से बचाता हो.
भाव लहरें जो मन में उठती हैं उन्हें रोकने का सेतु मेरे शब्द बनते हैं और शब्दों पर छायावाद की छाया शायद स्वत: ही आ जाती है.
"छायावाद के कवि वस्तुओं को असाधारण दृष्टि से देखते हैं. उनकी रचना की सम्पूर्ण विशेषताएँ उनकी इस 'दृष्टि' पर ही अवलम्बित रहती है.... वह क्षणभर में बिजली की तरह वस्तु को स्पर्श करती हुई निकल जाती है...अस्थिरता और क्षीणता के साथ उसमें एक तरह की विचित्र उन्मादकता और अंतरंगता होती है जिसके कारण वस्तु उसके प्रकृत रूप में नहीं, किंतु एक अन्य रूप में दीख पड़ती है. उसके इस अन्य रूप का सम्बन्ध कवि के अंतर्जगत से रहता है. यह अंतरंग दृष्टि ही छायावाद की विचित्र प्रकाशन रीति का मूल है." इन शब्दों में छायावाद के पूर्वगामी श्री मुकुटधर पांडेय जी ने काव्यान्दोलन की प्रधान विशेषता बताई. उन्होंने जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका 'श्रीशारदा' के 1920 के चार अंकों में छायावाद पर एक लेखमाला प्रकाशित करवाई थी जिसे मैं पढ़ना चाहती हूँ.

इस युग की रचनाओं में निहित छायाचित्रों के मूल में स्थित वास्तविकता या कल्पना से अनुरंजित नई भावदृष्टि को समझने की 'आंतरिक दृष्टि' है.
निराला जी ने इसे अकुंठित भाव से स्वीकार किया है –
"स्वच्छ एक दर्पण ----
प्रतिबिम्बों की ग्रहण शक्ति सम्पूर्ण लिए हुए.
देखता मैं प्रकृति चित्र --
अपनी ही भावना की छायाएँ चिरपोषित.
प्रथम जीवन में
जीवन ही मिला मुझे, चारों ओर."

सुमित्रनन्दन पंत यही बात दूसरे शब्दों में कहते हैं -
"इस तरह मेरे चितेरे ह्रदय की
बाह्य प्रकृति बनी चमत्कृत चित्र थी."

"मैंने मैं शैली अपनाई
देखा एक दुखी निज भाई
दुख की छाया पड़ी ह्रदय में
झट उमड़ वेदना आई.
निराला जी की उपर्युक्त घोषणा के आधार पर शिवदान सिंह चौहान का निष्कर्ष न्यायसंगत प्रतीत होता है कि "व्यक्तिगत सुख-दुखों की अपेक्षा अपने से अन्य के सुख-दुखों की अनुभूति ने ही नए कवियों के भाव प्रवण और कल्पनाशील ह्रदयों को स्वच्छन्दतावाद की ओर प्रवृत किया."
छायावाद युग के काव्य में पुरातन सामाजिक रूढ़ियों, नैतिक बन्धनों, आर्यसमाजी आचार संहिता आदि के विरुद्ध विद्रोह की भावना है. इसलिए शायद छायावादियों ने परिवार में पत्नी का स्वरूप प्रस्तुत कर अपने प्रेमभावना की अभिव्यक्ति नहीं की. सम्पूर्ण छायावादी काव्य में 'प्रेयसी' रूप में ही स्त्री का चित्रण मिलता है. इसे हम सामंतविरोधी दृष्टि कह सकते हैं.
सम्राट अष्टम एडवर्ड जब अपनी प्रेमिका के लिए सम्राट पद त्याग देते हैं तो निराला कहते हैं – "सिंहासन तज उतरे भू पर, सम्राट ! दिखाया सत्य कौन सा वह सुन्दर."
प्रेम के लिए सिंहासन का त्याग – इसे निराला सुन्दर सत्य की संज्ञा देते हैं.
इसी सत्य को व्यापकता में रखते हुए निराला जी सामंतविरोधी जीवनमूल्य भी प्रतिष्ठित करने से नहीं चूकते. 'प्रेयसी' शीर्षक रचना में 'प्रणय के प्रलय में सीमा सब खो गई' की जो स्वच्छंद भावना है, वह यथार्थ बोध के स्तर पर बन्धन मुक्ति की रोमांटिक तर्क पद्धति भी साथ साथ लाती है --


" दोनों हम भिन्न वर्ण
भिन्न जाति, भिन्न रूप
भिन्न धर्म भाव, पर
केवल अपनाव से, प्राणों से एक थे."


कुछ कुछ याद है कि 'रसमीमांसा' ग्रंथ की चर्चा की जाती थी, आचार्य शुक्ल का एक कथन जो मेरी डायरी में आज भी सुरक्षित है जो इस प्रकार है- "देश-प्रेम क्या है? इस प्रेम का आलम्बन क्या है? सारा देश अर्थात मनुष्य, पशु, पक्षी, नदी, नाले, वन, पर्वत सहित सारी भूमि. प्रेम किस प्रकार का है? यह साह्चर्यगत प्रेम है."
देश के वन, पर्वत, नदी, नाले, खेत-खलिहान आदि से हमारे भावों का सीधा लगाव होता है. इन पर प्रेम-भरी दृष्टि डालकर इनका चित्रण करने से साहचर्य जनित रतिभाव का ही उद्रेक होता है.
प्रकृति की गोद में कवि जिस आनंदातिरेक से झूमता हुआ दिखाई देता है, उसकी मूल प्रेरणा क्या मात्र सौन्दर्य प्रेम सम्बन्धी तथाकथित जन्म जात वासना मात्र है?
रोमांटिक काव्य में प्रकृति के प्रति साहचर्यगत प्रेम की अभिव्यक्ति को ही इतनी प्रमुखता हर जगह क्यों?

क्रमश:

Saturday, November 17, 2007

कोहरा या अम्बर की आहें !

आज सुबह सुबह जब घर से निकली तो देखा कि चारों तरफ गहरा कोहरा छाया हुआ है. 50 मीटर की दूरी तो क्या शायद 5 मीटर की दूरी पर भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. दुबई में सर्दी शुरु होते ही एकाध महीना ऐसे ही बीतता है. धड़कते दिल से धीरे धीरे कार लेकर सड़क पर आ गई.
आगे पीछे कोहरा ही कोहरा जैसे आकाश गहरी साँसें भरता हुआ धरा को अपनी बाँहों में समेटने के लिए नीचे उतर आया हो. सड़क के किनारे नज़र गई तो लगा जैसे धरती के माथे पर ओस की बूँदें पसीने सी चमक रही हों. सकुचाई सी , सिमटी सी हरे आँचल से चेहरे को ढके खड़ी की खड़ी रह गई थी.

मदमस्त आकाश धरती के रूप सौन्दर्य का प्यासा हमेशा से ही रहा है. एक दूसरे के प्रति गजब का आकर्षण लेकिन मिलन जैसे असंभव. दोनों की नियति यही है. धरती जब विरह की वेदना में तड़पती है तो आकाश ही नहीं रोता बल्कि मानव को भी रुला देता है.
सागर के ह्रदय में बसी वसुधा के मन में आकाश का आकर्षण है , यह एक ऐसा सत्य है जो नकारा नहीं जा सकता.
बादलों की बाँहों को फैलाए आकाश अपनी उठती गिरती बेकाबू होती साँसों पर काबू पाने की कोशिश करता बिल्कुल नहीं दिखाई दे रहा था. सोच रही थी शायद यही हाल सागर का भी हो जो अपने दिल में उठते भावों को भाप बना कर उड़ा रहा हो.
गहराते कोहरे को देख कर धरती से ज़्यादा मैं डरी सहमी सी धीरे धीरे ड्राइव कर रही थी. देख रही थी सड़क के किनारे खड़े खजूर के नर मादा पेड़ भी हतप्रभ से दिखाई दे रहे थे जो टकटकी लगाए बस कोहरे को नीचे उतरते देख रहे थे. दूर दूर तक सन्नाटा ही सन्नाटा ..स्तब्ध दिशाएँ . आगे पीछे इक्का दुक्का कारें जो मेरी ही तरह धीरे धीरे सड़क पर चल रही थी. सब कुछ धुँधला धुँधला सा.
अचानक आकाश ने अपना सीना चीरते हुए लाल चमकता हुआ सूरज सा दिल निकाल कर धरती को दिखाया, जिसे देख कर धरती का चेहरा उस प्रकाश से चमक उठा और दिशाएँ मुस्करा उठीं . माथे पर चमकता ओस सा पसीना धीरे से गुम हो गया.
आकाश के धड़कते दिल जैसे सूरज में प्यार का ऐसा ओज था , जिसे पाते ही हर दिशा जगमग करने लगी. धरती ने आकाश के प्यार की गरमाहट को अनुभव किया. हरी हरी घास की रंगत में और निखार आ गया था. खजूर के पेड़ों के बड़े बड़े पत्ते हवा के झोंकों से एक दूसरे की ओर बाँहें फैलाए मिलने को मचलने लगे. रंग-बिरंगे चटकदार फूल एक दूसरे को छू छू कर झूमने लगे. दिशाओं में फैली इस गरमाहट को मैंने भी महसूस किया..!

Wednesday, November 14, 2007

सिसकते भाव


हर्षवर्धन जी का लेख ज्यादा पढ़े-लिखे भारत को लड़कियां कम पसंद हैं पढ़कर मन बेचैन हो गया और बस सिसकते से भावों ने कविता का रूप ले लिया.




भाव मेरे वाणी बन अधरों पर आना चाहें
अंजानी शक्ति वाणी के प्राण हर लेना चाहे !


बात रुक गई, साँस घुट गई
आँखों में वीरानी छा गई !!
सिसकते भाव कुछ कहना चाहें
दुनिया कुछ न सुनना चाहे !!

भाव मेरे वाणी बन अधरों पर आना चाहें
अंजानी शक्ति वाणी के प्राण हर लेना चाहे !

सिसक कर जीते जाएँ भाव मेरे
तड़प कर मरते जाएँ भाव मेरे
सर पटक रोते जाएँ भाव मेरे
जीवन पाना चाहें भाव मेरे !!

भाव मेरे वाणी बन अधरों पर आना चाहें
अंजानी शक्ति वाणी के प्राण हर लेना चाहे !

Tuesday, November 13, 2007

टिप्पणियाँ - रंग बिरंगी खट्टी मीठी संतरे की गोलियाँ सी


अलग अलग टिप्पणियाँ जो रंग बिरंगी खट्टी मीठी संतरे की गोलियों की तरह लग रही हैं, बिल्कुल ऐसी ही रंग-बिरंगी गोलियाँ मेरे नानाजी की दुकान में अलग अलग शीशे की बोतलों मे रखीं होती थीं. देश के बटँवारे से पहले नानाजी एक होस्टल के वार्डन थे. भारत आने पर उन्हें गणित के अध्यापक का पद मिला.
नाना जी अध्यापक पद से सेवा मुक्त होने के बाद भी बच्चो की सेवा मे लगे रहे और कापी पेंसिल कलम दवात और खट्टी मीठी संतरे की फाड़ी जैसी गोलियों के साथ और भी बहुत कुछ दुकान मे रखते थे. याद आया...राम लड्डू , आम पापड़, उन्हीं के साथ तरह तरह के चूरन भी होते थे.
दोपहर और रात का खाना खाने जब भी नाना जी घर के पिछवाड़े जाते तो मुझे ही दुकान पर बैठना पड़ता. वह पल आनन्द की चरम सीमा को पार कर जाते. हर रोज़ एक दो संतरे की गोलियाँ या राम लड्डू चोरी चोरी खाने में बहुत मज़ा आता.
ओह बात हो रही थी खट्टी मीठी संतरे की गोलियों जैसी टिप्पणियों की. पर्यानाद जी को समझ नहीं आया. उस समय मुझे भी समझ नही आया था जब माँ ने कहा था "मू ते पैर मल". दरअसल समझना चाहिए था "मुँह और पैर मल" लेकिन समझा "मुँह के ऊपर पैर मल"
अनिल जी , पुरानी बातें सच में प्यारी होती हैं. आइए लौट चलें अपने बचपन में. कुछ देर के लिए मानस को भी संघर्षमयी जीवन से मुक्त कर दीजिए.
ज्ञान जी क्यों........ क्यों बचपन की सहजता विदा हो जाती है ???? यदि बचपन की यादें हिट पोस्ट बनती हैं तो जीवन भी हिट हो सकता है अगर हम अपने अन्दर के बालक को जिन्दा रखें. क्या ऐसा हो सकता है ?
राजीव जी , बीते हुए दिन हम खुद ही वापिस ला सकते हैं. जब बचपन को भूली दास्ताँ बना देते हैं तभी हम जीवन में दुखी हो जाते हैं. पुरानी यादों को नया रूप देते हुए कोई बचपना करके देखते हैं. बाल सुलभ हँसी तो फूटेगी ही, सेहत भी अच्छी रहेगी.
ममता जी, आप भी ....क्यों 'थे' का प्रयोग कर रही हैं. बचपन के दिनों की ममता आज भी हमारे आपके और सबके दिलों में है. क्यों न हम थोड़ा थोड़ा बचपन हर रोज़ जिएँ.
अनिल जी और हर्षवर्धन जी माता पिता को चाचा चाची कहना शायद आज भी सुना जा सकता है. मेरे अपने घर में मेरी मौसी को उनके बच्चे बहन जी बुलाते थे लेकिन शादियाँ होती गईं और नाम बदलते गए और इसी के साथ साथ भावनाओं के रूप भी बदलते गए. अब कहाँ सयुंक्त परिवार हैं . परिवार ईकाइयों में बँटते बँटते इतने छोटे हो गए हैं कि उनमें प्रेम, स्नेह , सहनशीलता, संयमशीलता , संवेदनशीलता और भावनाओं का स्थान भी संकुचित होता जा रहा है.
नीलिमा जी आपकी मन्द मुस्कान में अभी भी बच्चों की मासूमियत है. एक भेद की बात यह है कि मुस्कान सुन्दरता को कायम रखने की अचूक दवा है. यही नहीं कई बीमारियों को दूर करने में सहायक बनती है. मुस्कान सेहत के लिए बहुत लाभकारी है इस पर एक अलग पोस्ट लिखने की सोच रही हूँ.
अफलातून जी शैशव का प्रसंग शायद सबको प्रसन्न कर देता है और सभी अपने बचपन की यादों में खो जाते हैं लेकिन धीरे धीरे बच्चों जैसी मासूमियत कहीं खो जाती है.
बालकिशन जी समझदारी की धूल क्यों ? दिन में एक बार तो हम 'डस्टिंग' झाड़पोंछ करते ही हैं तो व्यस्त जीवन पर पड़ी समझदारी की धूल को भी झाड़ देते हैं.
नीरज जी की प्यारी 'मिष्टी' जैसे हम सब बन जाएँ तो सोचिए दुनिया का रूप कैसा हो जाएगा. घुघुती जी क्यों क्या ख्याल है आपका ? पुनीत जी, सच कहूँ तो पंजाबी भाषा का आकर्षण आज भी दिल और दिमाग पर छाया हुआ है. पंजाबी बोलती नहीं लेकिन सुनकर समझने की कोशिश आज तक जारी है.
संजीत जी अगर आपको तस्वीर इतनी अच्छी लगी है तो सोचिए अगर हम सब बच्चों जैसे मासूम हो जाएँगे तो कैसा अनुभव होगा !! पल में रूठ कर फिर हमजोली बन जाएँगे.
इसी बात का जिक्र करते करते 'दो कलियाँ' फिल्म का एक गीत याद आ गया जो मैने पाँचवीँ कक्षा में पहली बार स्कूल की प्रार्थना सभा में गाया था.
आइए सुनते हैं बाल कलाकार के रूप में नीतू सिंह पर फिल्माया यह गीत ...

बच्चे मन के सच्चे, सारे जग की आँखों के तारे .......... !

गीत सुनने के बाद कैसा लगा !! मुझे तो लगता है कि हम बचपन में लौट चलें !!!!!!!!!!

Monday, November 12, 2007

"ऐ की कर रई ऐं..मु ते पैर मल"



कुछ दिन पहले ज्ञान जी को बचपन में खाए मंघाराम एण्ड संस के बिस्कुट याद आए, फिर चना ज़ोर गरम याद आ गया तो हमें भी माँ की मीठी डाँट खाने की एक घटना याद आ गई. बात उन दिनों की है जब हम लगभग 8-9 साल के रहे होंगे. किसी कारणवश हमें तहसील बल्लभगढ़ में कुछ साल नानी के पास रहना पड़ा जहाँ हिन्दी बोली जाती है. वापिस माँ के पास आने पर एक अजीब से डर के कारण चुप रहने लगे थे. माँ को आंटी कहते थे और जो वे कहतीं चुपचाप मान जाते. माँ बेटी में एक अजनबीपन का रिश्ता था जिसे माँ स्वीकार नहीं कर पा रही थीं. हम भी अपने में ही मस्त रहते और माँ से थोडा दूर ही रहते. एक कारण शायद यह भी था कि पंजाबी भाषा समझ न आने पर हम और अधिक अंर्तमुखी हो गए थे.

बात नन्हें बचपन की थी जब डरने के बावजूद भी हम शरारत करने से चूकते नहीं . खाना खाने से पहले साबुन से हाथ-पैर धोने गए तो खेल में लग गए. साबुन को रगड़ते हुए उसकी सफेद झाग हाथों पर और उस पर तरह तरह की आकृतियाँ बनाने का मज़ा ही अलग आ रहा था. माँ ने देखा और रौबीली आवाज़ मे कहा – 'ऐ की कर रई ऐं..मु ते पैर मल , अच्छी तरा साफ कर.' हम माँ का मुँह देखने लगे. समझने की कोशिश कर रहे थे कि क्या करने को कहा जा रहा है. माँ फिर से थोड़ा और ऊँची आवाज़ मे बोली – "मेरा मूँ की देखनी ऐ... मै कह रईयाँ मूँ ते पैर मल." कड़कड़ती आवाज़ सुनते ही हमने आव देखा न ताव .. चुपचाप अपना पैर उठा कर मुँह पर रगड़ने की कोशिश करने लगे. पंजाबी भाषा हमारे सिर के ऊपर से निकल जाती. बाल-बुद्धि समझ नहीं पा रही थी कि यह कैसा रौब है अपने आप को माँ साबित करने का.

बाद में माँ ने बताया कि पहले तो उन्हें बहुत हँसी आई थी. घर भर में इस बात को लेकर ठहाके लगाए गए थे. बाद मे वे बहुत संजीदा होकर सोचने पर लाचार हो गई थी कि पंजाबी न बोलने पर उन्हें गुस्सा आ रहा है या शायद आँटी सम्बोधन को स्वीकार नहीं कर पा रही थीं. उन्होंने सोचा कि मुझसे दोस्ती करके ही अपने नज़दीक ला सकती हैं. आज हम दोनों माँ बेटी बहुत अच्छे दोस्त हैं. पंजाबी सिखाते सिखाते माँ स्वयं ही हिन्दी बोलने लगीं हैं.

Sunday, November 11, 2007

मानव की प्रकृति

विद्युत रेखा हूँ नीले अंबर की
स्वाति बूँद हूँ नील गगन की !

गति हूँ बल हूँ विनाश की
अमृत-धारा बनती विकास की !

अग्नि-कण हूँ ज्योति ज्ञान की
मैं गहरी छाया भी अज्ञान की !

मैं मूरत हूँ सब में स्नेह भाव की
छवि भी है सबमें घृणा भाव की !

वर्षा करती हूँ मैं करुणा की
अर्चना भी करती हूँ पाषाण की !

सरल मुस्कान हूँ मैं शैशव की
कुटिलता भी हूँ मैं मानव की !!

Saturday, November 10, 2007

अपनी नज़र और अपनी सोच से देखिए !







दीपावली की पूजा !

खामोश घर में एक अजीब सी बेचैनी के साथ हम बैठे सोच रहे थे कि पर्वों का महत्त्व परिवार और मित्रों के साथ ही होता है. पर्व मनाए ही इसलिए जाते हैं कि आपस के मेल-मिलाप से प्रेम और भाईचारे का भाव बढ़े.
दीपावली का पर्व मिले जुले अनुभवों के साथ कुछ यादें छोड़ कर बीत गया. शायद यही पर्व व्यस्त जीवन में खुशी के दो पल देकर उर्जा प्रदान करते हैं. जीवन फिर से पुराने ढर्रे पर चलना शुरु हो जाता है. हम एक नए उत्साह के साथ संघर्षो से जूझने को तैयार हो जाते हैं.
अभी हम सोच ही रहे थे कि छोटी बहन का फोन आया. फोन पर बात कम और पटाखों की आवाज़ ज़्यादा आ रही थी. हँसते हुए बहन ने कहा कि पटाखों और संगीत की आवाज़ सुनकर ही मन को समझा लो. लेकिन ऐसा हो न सका.
माता-पिता और बच्चे परिवार की सबसे करीबी इकाई होते हैं. बेटे पिता को याद कर रहे थे जो काम के कारण आ नही सकते थे. उस समय एक दो मित्र भी बहुत बड़ा सहारा बन कर खुशी दे गए.
बहुत पहले पति एक लकड़ी की जड़ लेकर आए थे जो ओम की आकृति की थी लेकिन थोड़ा घुमा कर रखने पर वही ओम अल्लाह के रूप में दिखने लगता. हमने निश्चय कर लिया कि इसी लकड़ी के ओम की पूजा की जाएगी और साथ मे चाँदी के सिक्के को रखा जाएगा जिस पर एक तरफ गणेश जी और दूसरी तरफ लक्ष्मी जी का चित्र होता है.
पूजा की थाली सजाई गई जिसमें लकड़ी का ओम और चाँदी का सिक्का रखा गया. ताज़े फल और फूल के साथ दूध जलेबी. दिए की जलती लौ और अगरबत्ती से घर भर में एक अजीब सी चमक और महक फैल रही थी. संस्कृत के श्लोक, जो समझ में कम आते हैं लेकिन एक अद्भुत शक्ति का संचार करते हैं, सारे घर में गूँज उठे.
परिवार और मित्रों के लिए ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में सुख-शांति की कामना करते हुए हाथ जोड़ दिए.

Wednesday, November 7, 2007

प्राणों का दीप












प्राणों का दीप जलने दो
जीवन को गति मिलने दो !

विश्व तरु दल को न सूखने दो
वसुधा को प्रेमजल सींचने दो !

विषमता का शूल न चुभने दो
जीवन-पथ को निष्कंटक करने दो !

अनिल से अनल को मिलने दो
प्रचंड रूप धारण करने दो !

सिन्धु-सरिता की सुषमा बढ़ने दो
धरा-अंबर की शोभा निखरने दो !

घन-चंचला कुसुम खिलने दो
विश्व उद्यान माधर्य बढ़ने दो !

प्राणों का दीप जलने दो
जीवन को गति मिलने दो !!

Tuesday, November 6, 2007

मेरे पास सिर्फ एक लम्हा है !


मृत्यु अंधकारमय कोई शून्य लोक है

या

नवजीवन का उज्ज्वल प्रकाशपुंज है

या

मृत्यु-दंश है विषमय पीड़ादायक

या

अमृत-रस का पात्र है सुखदायक


तन-मन थक गए जब यह सोच सोच
तब मन-मस्तिष्क मे नया भाव जागा ------


मेरे पास सिर्फ एक लम्हा है
जो प्यार से लबालब भरा है !!

इस लम्हे को बूँद बूँद पीने दो
इस लम्हे को पल-पल जीने दो !

उसे बचपन सा मासूम ही रहने दो
मस्त हवा का झोंका बन बहने दो !

यौवन रस उसमें भर जाने दो
झर-झर झरने सा बह जाने दो !

इस लम्हे को ओस सा चमकने दो
इस लम्हे को मोम सा पिघलने दो !

पतझर के पत्तों सा झर जाने दो
झरझर कर पीले पत्तों सा गिर जाने दो !

लम्हा बना है अनगिनत पलों से कह लेने दो
लम्हा अजर-अमर है, इस मृग-तृष्णा में जीने दो !!

Monday, November 5, 2007

'जब मैं मर गया उस दिन' /'जब मैं मर जाऊँ उस दिन'



कभी कभी ऐसा संयोग होता है कि हम हैरान रह जाते हैं. अभी परसों ही रवीन्द्र जी का व्यंग्य लेख 'जब मैं मर गया उस दिन' पढा था और उसके बाद चिट्ठाकारों की टिप्पणियाँ भी पढ़ने को मिलीं. उच्च कोटि का व्यंग्य सबने सराहा. 'जब मैं मर जाऊँ उस दिन' यह बात आज अपने बेटे के मुँह से सुनने पर मैं सकते में आ गई. कोई टिप्पणी नहीं सूझ रही थी. साहित्यकार, लेखक , चिट्ठाकार और कवियों की मृत्यु पर लिखी गई रचनाओं को हम ध्यान से पढ़ते हैं और प्रशंसा भी करते हैं लेकिन जब अपनी संतान इस तरह के विषय पर चर्चा करना चाहे तो हम उनका मुँह बन्द कर देना चाहते हैं.
पहली बार अनुभव हुआ कि पढ़ने और सुनने में पीड़ा अलग-अलग थी. पता नहीं क्यों आज अचानक बेटे को सूझा कि माँ को सामने बिठा कर इसी विषय पर ही चर्चा करनी है कि 'जब मैं मर जाऊँ उस दिन' उसे चेरी के सुन्दर पेड़ के नीचे ही सदा के लिए सुला दिया जाए. दार्शनिक बना बेटा माँ को समझाने की कोशिश कर रहा था कि मृत्यु से बड़ा कोई सच नहीं. बहुत पहले जापान के चेरी पेड़ के बारे में बताते हुए बेटा बोला था कि इस पेड़ से खूबसूरत कोई पेड़ नहीं और इस पेड़ के नीचे आराम की नींद सोने का आनन्द अलौकिक ही होगा. उस समय मुझे सपने मे भी ख्याल नहीं आया था कि आराम की नींद से अर्थ चिर निद्रा लगाया जा रहा है. मैं हतप्रभ टकी टकी सी लगाए मुस्कराते बेटे को देख रही थी जिसकी बातों से मेरे चेहरे की मुस्कराहट गायब हो चुकी थी.

कैक्टस के स्वादिष्ट फल !


कौन कहता है कि कैक्टस में सिर्फ कांटे ही कांटे होते हैं , उसमें रंग-बिरंगे फूल भी होते हैं और फल तो और भी स्वादिष्ट होते हैं. रवि रतलामी जी की कैक्टस गार्डन पर सुन्दर एलबम देखकर उसके मीठे रसदार फल की याद ताज़ा हो गई और मुहँ में पानी आ गया. सोचा कि आप सबसे उस स्वाद को बाँटा जाए. कैक्टस के फलों का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है. कैक्टस के फल के चित्र और उसे काटने का तरीका बताने के लिए एक वीडियो लगाने का प्रयास किया है.






video

Sunday, November 4, 2007

दुनिया एक किताबखाना

दुनिया एक किताबखाना है , हर शख्स यहाँ बेनाम किताब है
किताबों की इस दुनिया में , दाना भी हैं औ' अनपढ़ बेहिसाब हैं !!

जिल्द देख कर कभी कभी
किताब को नाम दिया जाता है ,
पहले पन्ने को पढ़ कर भी
कभी कभी नाम दिया जाता है !

दुनिया एक किताबखाना है , हर शख्स यहाँ बेनाम किताब है

बनावट एक सी है हर किताब की
जिल्द फर्क फर्क हर किताब की
सुनहरा वर्क देख मन ललचा उठे
खूबसूरत लिखावट देख सब भरमा उठे !

दुनिया एक किताबखाना है , हर शख्स यहाँ बेनाम किताब है

सादी किताब सीधी तकरीर
कोई-कोई ही समझे ये तदबीर
सादा लिबास सादा नाम
कोई न देखे उसका काम !!

दुनिया एक किताबखाना है , हर शख्स यहाँ बेनाम किताब है

Saturday, November 3, 2007

मेरे सपनों का जश्न




क्यों तटस्थ रहूँ मैं सदा मौन
अनुचित पर चिंतन करे कौन !

क्यों खामोश रहे मेरी सोच
क्यों ने मिले उसे कोई बोल !


क्यों उठे हूक जब होती चूक
क्यों चुभे शूल जब होती भूल !


क्यों हर वर्ग अलग हर पर्व मनाएँ
क्यों ने वर्ग सभी सब पर्व मनाएँ !

क्यों मेरी दीवाली, तेरी ईद, बड़ा-दिन उसका
क्यों न हो हर पर्व तुम्हारा , मेरा उसका !

सीधा नहीं सवाल , बड़ा ही जटिल प्रश्न है
मेरे सपनों का जश्न नहीं, यह और जश्न है !!

Friday, November 2, 2007

तम ने घेरा !

तम ने घेरा मेरे तन को
कुछ न सूझे मेरे मन को.

छोटे छोटे कण्टक-कुल में
उलझा आँचल मेरा !
घायल औ' निष्प्राण हो गया
रोम-रोम मेरे तन का !

तम ने घेरा मेरे तन को
कुछ न सूझे मेरे मन को.

जीवन-पथ में फूल नहीं हैं
फूलों में सुगन्ध नहीं है !
अमृत-रस धारा भी नहीं है
सतरंगी आभा भी नहीं है !

तम ने घेरा मेरे तन को
कुछ न सूझे मेरे मन को.

निशा अन्धेरी चन्द्रहीन है
रवि दिवस भी तेजहीन है !
आशा की कोई किरण नहीं है
निराशा की घनघोर घटा है !

तम ने घेरा मेरे तन को
कुछ न सूझे मेरे मन को.

Thursday, November 1, 2007

हाईकू : चित्रों में


कटते वृक्ष
ज़मीन सिसकती
गहरी पीड़ा.





पिचका पेट
भूख से धँसी आँखें
भविष्य ज़र्द




विवशता थी
दायरों का घेरा है
बँधना ही था.





युद्ध की आग
बिलखे बचपन
कुछ न सूझे.



(गूगल द्वारा चित्र)