Tuesday, October 30, 2007

M.P. सिर्फ मध्य प्रदेश नहीं, 'मेरे प्यारे' भारत का ह्रदय है !

यह उन दिनों की बात है जब मैं रियाद के इंटरनेशनल इंडियन स्कूल में पढ़ाया करती थी. स्कूल की एक अध्यापिका का हम पर असीम प्रेम था और आज भी है. एक बार उन्होंने बड़े प्यार से एक दावत पर बुलाया , वहाँ पहुँच कर पता चला कि मध्य प्रदेश की एक एसोशियसन 'मिलन' की पार्टी चल रही है. हमें वहाँ देख कर सभी जानने के लिए उत्सुक हो उठे कि हम उस 'मिलन' की पार्टी में पहुँचे कैसे ! इसके पीछे उनके मन में हमारे लिए न कोई दुराव था न बैर-भाव , यह हम जानते थे. कुछ चेहरे चमक उठे और कुछ भावहीन से हो गए.
पता नहीं क्यों हमें ही कुछ अटपटा सा लगने लगा था कि मध्य प्रदेश में न जन्में, न शिक्षा पाई , न ससुराल फिर हम इस एसोशिएसन की पार्टी में क्या कर रहे हैं. सब लोग इस बारे में पूछ रहे थे और हमसे कोई जवाब देते नहीं बन रहा था. हम दिल्ली मे जन्में, पले-बढ़े, पता चलने पर उनकी आँखों में प्रश्न चिन्ह सा दिखाई देता कि फिर यहाँ क्या कर रहे हैं !
क्या कहें कि हम कैसे किसी का प्रेम और आदर से दिया गया निमंत्रण ठुकरा दें.
शेरो-शायरी , खेल और भोजन के बाद हम वहाँ से निकले तो अपने आप ही दिल और दिमाग से कविता के रूप मे शब्द उमड़-घुमड़ करने लगे. आज इस घटना को याद करने का कारण संजीत जी की छत्तीसगढ़ पर लिखी पोस्ट और उस चार चाँद लगाती टिप्पणियाँ हैं. अब छत्तीसगढ़ अलग अंग है लेकिंन सन 2000 से पहले मध्य प्रदेश का ही अंग था और मध्य प्रदेश भारत में ...भारत हमारा, तो मध्य प्रदेश भी प्यारा और अब छत्तीसगढ़ भी प्यारा है.

M.P. सिर्फ मध्य प्रदेश नहीं
'मेरे प्यारे' भारत का ह्रदय है !

M.P. सिर्फ वहाँ के लोगों का नहीं
'मेरा प्यारा' प्रदेश सबका अपना है !

एम पी हमारा जन्म स्थल नहीं
एम पी हमारा कर्म स्थल नहीं !

एम पी प्यारा फिर भी हम सबका है
एम पी प्यारा भारत का अपना है !

इसलिए

अपनी बाँहो का घेरा बढ़ा लो
अपने आँचल की स्नेही छाया दो !

हर मानव को प्यार से अपना लो
'मिलन' को प्यारा दुलारा बना दो !

क्योंकि

मिलन होगा जब यहाँ मानव मानव का
मिलन होगा जब यहाँ भाषा भाषा का !

मिलन होगा जब यहाँ भिन्न धर्मो का
मिलन होगा जब यहाँ की जातियों का !

मन पपीहा(M.P) तब मस्त होगा सभी का
मुख प्यारा (M.P) तब खिल उठेगा सभी का !

मधु प्याला(M.P) प्रेम-रस का मिलेगा सभी को
मीत प्यारे(M.P) तब मिलेगे हम सभी को !!

ब्लॉगवाणी के साथ करवाचौथ !!

गहरी नींद के सागर में डुबकियाँ लगा ही रही थी कि अचानक सुबह-सुबह मोबाइल बज उठा. हड़बड़ा कर उठी, कुछ पल लगे संयत होने में, देखा कि यह अलार्म नहीं बल्कि सखी का सन्देश है कि सरगी(व्रत रखने वाली औरते सुबह उठ कर सास द्वारा दिया खाना खाती हैं) के लिए उठ जाओ. हम दोनों का घर एक ही बिल्डिंग में है और अक्सर शामें एक साथ गुज़रती हैं. शुक्रिया का जवाब लिख कर मैं उठी सरगी की तैयारी करने. खाने-पीने की प्लेट लेकर कम्पयूटर के सामने आ बैठी और् पतिदेव की तस्वीर को डेस्कटॉप की बेकग्राउण्ड पर सेट कर दिया. पतिदेव की तस्वीर तो देख ही रही थी लेकिन ब्लॉगजगत की साइट भी मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रही थी.

सोचा सिर्फ करवाचौथ पर लिखी रचनाओं को ही पढेंगें सो मुस्कराकर तस्वीर से माफी माँगी और ब्लॉगजगत की साइट खोल ली.करवा-चौथ से जुड़े कुछ चिट्ठे पहले ही ब्लॉगवाणी की शोभा बढ़ा रहे थे. एक एक करके चिट्ठे खोले और पढ़ना शुरु कर दिया. सुनिता जी के लेख से जहाँ व्रत के बारे में जानकारी मिली , वहीं अनुराधा जी की रचना मे व्रत से जुड़े अनुभवों को पढ़कर अच्छा लगा. अर्बुदा के भाव भीने हाइकू रंगीन चित्रों के साथ पढ़कर आनन्द भी दुगना हो गया. आज उल्लू की विशेष पूजा है.... पढ़कर हम हैरान रह गए. यह हमारे लिए नई जानकारी थी.

कोई और चिट्ठा खोलती उससे पहले ही यादों का सैलाब उमड़ पड़ा. साउदी अरब में सालों से करवा-चौथ के व्रत रखने का अलग ही आनन्द था. ससुराल से सन्देश आता कि कम से कम उस दिन काला कपड़ा न पहनना लेकिन उसी दिन हमें काले बुरके में ही चाँद देखने के लिए बाहर जाना पड़ता. रेगिस्तान में कहीं दूर चाँद दिखता और वहीं दिया जला कर चाँद की पूजा की जाती और जल चढ़ाया जाता. काले दुपट्टे की ओट से चांद और पति को देख कर व्रत खोलते. जलते दिए को वहीं किसी झाड़ी की ओट में रख कर लौट आते. मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करते कि लाज राखो प्रभु , तेरा ही आसरा है. पूजन-विधि नहीं पर श्रद्धा-विश्वास को स्वीकारो. मन में अटल विश्वास और आस्था की लौ जलाए घर लौट कर सब मिलकर रात का खाना खाते और टी.वी. पर ही करवा-चौथ के अलग अलग क्रार्यक्रम देख कर आनन्द लूटते.

साढ़े आठ बज चुके थे , चाँद के निकलने का समय हो गया था , हम भी निकल पड़े कार निकाल कर . खुले आकाश को देखने के लिए कार से ही जाना पड़ता है. पाँच मिनट बाद ही घर से कुछ दूरी पर खुले आकाश में चाँद मुस्कराता खिला सा दिखने लगा. अर्बुदा और मैंने पूजा की और कुछ देर चाँद को निहारा और वापिस लौट आए. आज करवाचौथ का व्रत ब्लॉगवाणी के साथ कैसे बीत गया पता ही नहीं चला. शायद सुबह सुबह हमने प्रभु राम और सीता का नाम ले लिया था सो दिन अच्छा बीतना ही था.
इस बारे में चर्चा कल करेंगे.

Monday, October 29, 2007

नभ की सुषमा

अभी तो सूरज दमक रहा है. दिन अलस जगा है.
चंदा के आने का इंतज़ार अभी से क्यों लगा है !
बस उसी चंदा के ख्यालों में मेरा मन रमा है
नभ की सुषमा देखने का अरमान जगा है !
कविता के सुन्दर शब्दो का रूप सजा है
अब ब्लॉगवाणी पर पद्य मेरा हीरे सा जड़ा है !



नील गगन के नील बदन पर
चन्द्र आभा आ छाई !

ऐसी आभा देख गगन की
तारावलि मुस्काई !

नभ ने ऐसी शोभा पाई
सागर-मन अति भाई !

कहाँ से नभ ने सुषमा पाई
सोच धरा ने ली अँगड़ाई !

रवि की सवारी दूर से आई
उसकी भी दृष्टि थी ललचाई!

घन-तन पर लाली आ छाई
घनघोर घटाएँ भी सकुचाईं !

नील गगन के नील बदन पर
रवि आभा घिर आई !

ऐसी आभा देख गगन की
कुसुमावलि भी मुस्काई !

नील गगन के नील बदन पर
चन्द्र आभा आ छाई !

Sunday, October 28, 2007

चित्रों में हाइकू !



शिथिल अंग
ममता असीम है
शिशु निश्चिंत !


( मिट्टी की मूरत का मेरे द्वारा खींचा गया चित्र )

Saturday, October 27, 2007

हर् रचना के साथ लगाई तस्वीरों की कहानी !


मेरी हर रचना के साथ जो भी तस्वीरें हैं उनमें से कुछ मेरे द्वारा ही खींची गईं हैं शेष गूगल से ली गई हैं. यहाँ उनका विवरण दिया जा रहा है --




ईरान में मित्र का घर्




ईरान में मित्रों के साथ







दुबई





ईरान 'तहरान'






मेरी रसोई-घर में ईरानी केतली-कूरी






रियाद के घर में ताज़े फूलों का गुलद्स्ता






मेरे छोटे बेटे विद्युत द्वारा बनाया गया चित्र

यह चित्र भी विद्युत द्वारा बनाया गया.

















दमाम (साउदी अरब)










तहरान से रश्त(उत्तरी ईरान) की हवाई यात्रा के दौरान खींचा गया चित्र



दमाम के समुद्र का किनारा









ब्लॉग मे लगाए गए शेष सभी चित्र गूगल के सौजन्य से !

Friday, October 26, 2007

नया प्रयास - पहला हाईकू तस्वीर के साथ !

मैंने थामा है
शक्ति पुंज दिनेश
दोनो हाथों में.

मेरे प्यारे काका सर्प न्यारे हैं बड़े !

माँ, आपकी अनुमति से आज अपनी इस कविता को पन्नों की कैद से आज़ाद कर रही हूँ. आज सुबह का पहला ब्लॉग जो खुला उसे पढ़कर बहुत सी पुरानी यादें ताज़ा हो गईं. वे सभी डर जो मुझे सताते थे वे किसी ओर को भी सताते हैं जानकर तसल्ली हुई कि मैं अकेली नहीं इस दुनिया में. मेरे जैसे बहुत हैं जो अन्दर ही अन्दर एक डर से जकड़े हुए हैं. कुछ लोग स्वीकर कर लेते हैं और कुछ लोग इस डर को चाह कर भी दिखा नहीं पाते.

(इस कविता में श्री अज्ञेय जी की कविता के एक अंश का सहारा लिया गया है जिससे कविता आगे बढ़ पाई. सही में कहा जाए तो मेरा एक सपना है और था कि उनसे एक मुलाकात कर पाती)


" मेरे आँगन में नीम के पेड़ तले

सदियों से एक विषधर हैं पले !


मेरे प्यारे काका सर्प न्यारे हैं बड़े

माथे पर उनके मणिमाणिक हैं जड़ें !


होती हर सन्ध्या मेरी काका के संग

बैठ कर मैं भी रंग जाती उनके रंग !


लेकिन आज जाने क्यों उदास थे पड़े

बेचैनी से दूध का कटोरा किए थे परे !


खड़ी थी व्याकुल मैं आँखों में आसूँ भरे

मुझे देख पीड़ा में घाव उनके हुए हरे !


सम्मानित अतिथि एक हमारे घर थे विराजे

जाने-माने कविराज हमारे घर थे जो पधारे !


आँगन में आए थे टहलने , देखा सर्पराज को

आश्चर्य चकित हुए, देखा जब नागराज को !


मन में उनके प्रश्न कई एक साथ जन्मे

उत्तर एक पाने को कविराज थे मचले !


पूछने लगे उत्साहित होकर सर्पराज से ----

"हे साँप , तुम सभ्य हुए नहीं, न होगे

नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया

फिर कैसे सीखा डसना , विष कहाँ से पाया !"


मैं सुनकर सकते में आई , फिर सँभली

खिसियानी बिल्ली सी फीकी हँसी हँस दी !


फिर बोली विषधर से, अपने प्यारे काका से

यह तो सीधा कटाक्ष हुआ है शहरी मानव पे !


मेरी तुलना मानव से क्यों -- काका मेरे चिल्लाए

मानव से तुलना क्यों यह सोच-सोच भन्नाए !


विषधर मेरा नाम जैसा अन्दर , बाहर भी वैसा

विष उगलना मेरा काम, अन्दर बाहर एक जैसा !


मानव-मन से कब विष उगलेगा, कब अमृत बरसेगा

उसका मन पाषाण रहेगा या मोम सा भी पिघलेगा !


कोई न जाने, वो खुद न जाने , मायाकार स्वयं न जाने

फिर मेरी तुलना मानव से क्यों मेरा मन यह न माने !


करारी चोट लगी सुनकर अपने काका की बातें

मन तड़पा रोया काका की बातें थीं गहरी घातें !


मैंने मानव-जन्म क्यों पाया, सोच-सोच मन अकुलाया

विषधर काका जैसे मैं भी हो जाऊँ मन मेरा भरमाया !!!!




Thursday, October 25, 2007

तपता - हँसता जीवन !

सूरज का अहम देख कर
चन्द्र्मा मन ही मन मुस्करा उठा
और सोचने लगा -
अपनी आग से सूरज
धरती को देता है नवजीवन ही नहीं
मन-प्राण भी उसका झुलसा देता है.
धरती के हरयाले आँचल से
टके हुए ओस के मोती चुरा लेता है.
स्वयं पल-पल जलता है
और प्रकृति का रोम-रोम भी जला देता है
अपने आप में भूला, जलता जलाता सूरज
मेरे आसितत्व को ही भुला देता है
समझता नहीं सूरज कि मैं भी
धरती के मन-प्राणों में शीतलता भर देता हूँ
अपनी सुषमानूभूति से मैं
जलती धरती को मुस्काना सिखा देता हूँ.
मैने दोनो को हँस कर देखा
और सोचा कि मेरे जीवन में
दोनों का ही महत्त्व है ---
सूरज जीवन में जलना तपना सिखाता है
चन्द्र्मा जलते-तपते जीवन में हँसना सिखा देता है......!

Wednesday, October 24, 2007

ज़िन्दगी इत्तेफाक है !

घर पहुँच कर राहत की साँस ली कि आज फिर हम बच गए. हर रोज़ बेटे को कॉलेज छोड़ने और वापिस आने में 80 किमी के सफर में कोई न कोई सड़क दुर्घटना का शिकार दिख ही जाता है. कभी कभी 160 किमी भी हो जाता है गर कोई टैक्सी या प्राइवेट ड्राइवर ने मिले. मेरे रास्ते में हर रोज़ की दुर्घटनाओं में से चुने कुछ चित्र हैं -


रास्ते में दुबई के हिन्दी रेडियो सुनना संजीवनी बूटी सा काम करता है. अचानक बीच में ही रेडियो प्रसारण में फोन वार्ता में एक महिला की दर्द भरी आवाज़ मे मदद के लिए गुहार थी . एक सड़क दुर्घटना में उसके 22 साल के बेटे को एक टाँग से हाथ धोना पड़ा, महीना भर कोमा रहा जिसकी तीमारदारी में 25 साल के बड़े बेटे को नौकरी से निकाल दिया गया. सुनकर दिल बैठ गया... मृत्यु चुपचाप आकर ले जाए तो कोई दुख नहीं क्योंकि एक दिन जाना ही है लेकिन इस तरह अंग-भंग होना या अकाल मृत्यु का पाना पूरे वजूद मे एक सिहरन पैदा कर देता है.
फौरन हमने दूसरा हिन्दी स्टेशन ढूँढा जहाँ जो गीत बजा बस उसके सुनते ही सारा डर हवा हो गया.

आप भी सुनिए और सोचिए कि सुर और लय का हमारे ऊपर क्या असर होता है.

ज़िंदगी इत्तेफाक़ है

बात जो रास्ते का पत्थर थी !

सुबह सुबह का अनुभव लिखने के बाद हम बैठे पढ़ने अलग अलग चिट्ठे. जितना पढते गए उतना ही अपने को पहचानते गए लगा कि शायद बहुत कुछ है जो अभी सीखना है , बहुत कुछ है जो मेरी समझ से बाहर है. क्यों समझ से बाहर है यह आज तक समझ नहीं आया. जीवन को सही चलाने के लिए जो छोटी छोटी बातें हैं वही समझ आती हैं. क्यों जीवन से जुड़े कुछ विषयों पर बुद्धि काम नहीं करती. अचानक लगने लगा चिट्ठाजगत के इस अथाह सागर के कुश्ल तैराक नहीं हैं. लिखी बात अगर समझ न आए तो मन छटपटाने लगता है अपने आप से ही सवाल करने लगता है कि क्यों बात का हर स्वरूप हम समझ नहीं पाते.. ..... मानव की स्वाभाविक इच्छा है सब कुछ जानने समझने की ... बात जो समझ नहीं आती लेकिन उसके अलग अलग रूप दिखाई देते हैं उस पर एक छोटी सी कविता ----


बात जो रास्ते का पत्थर थी

लोगों की पूजा ने कभी उसे पहाड़ बना दिया

लोगों की ठोकरों ने कभी उसे कंकर बना दिया


बात जो रास्ते का कंकर थी

समय की मार से कभी धूल बन गई

वही धूल आँखों की कभी किरकरी बन गई


बात जो आँखों की किरकरी थी

आँसू बन बहती गुम हो गई गालों पर

वही बात मुस्काई खिले गुलाब सी पलकों पर


बात जो खिलते गुलाब जैसी थी

कभी काँटा बन चुभती चली गई मन में

कभी सुगन्ध बन फैलती चली गई तन में

Tuesday, October 23, 2007

मधुशाला कहें या पाकशाला !

अंर्तजाल पर आए थे जीवन के नए-नए पाठ पढ़ने , पहुँच गए चिट्ठाजगत की मधुशाला में. एक प्यारी सी सखी जो खुद एक चिट्ठाकार हैं जबरन ले आईं यहाँ और बार टैंडर बन कर हर ब्लॉग को खोल खोल कर ज़रा ज़रा चखा कर हरेक की खासियत बताती जाती. हम थे कि एक साथ कई ब्लॉग कॉकटेल की तरह गटक गए. ऐसा नशा हुआ कि हैंग ओवर भगाने के लिए सुबह-सुबह भी एकाध ब्लॉग की ज़रूरत होने लगी जैसे सुबह ताज़ा अखबार खोलने का आनन्द अलग है. उसी तरह ब्लॉग पढ़ने का अपना ही एक नशा है. धीरे धीरे ऐसा नशा छाया कि कब हम इस आदत के शिकार हो गए पता भी नहीं चला. समझ न आए कि चिट्ठाजगत मधुशाला की पाठशाला है या इस पाठशाला मे कोई मधुशाला है.
हर चिट्ठे की अपनी विशेषता, नशे का स्तर अलग अलग. किसी को पढ़कर पीकर गम्भीर हो जाना, आत्मचिंतन करने पर विवश हो जाना, किसी को पढकर हँसना, किसी को पढ़कर आँखें नम करना. सुख-दुख की अनुभूति, विषाद और पीड़ा के भाव सब मिल कर एक अलौकिक नशे में डुबो देता.
इस अलौकिक आनन्द में अभी हम डुबकियाँ लगा ही रहे थे कि नींबू के रस की तरह बच्चे टपक पड़े और सारा नशा हिरन कर दिया. उन्हें पेट की भूख सता रही थी, उनके लिए पाकशाला जाने के अलावा कोई चारा न था सो लड़खड़ाते कदमों से मन मार कर उठे खाना पकाने.
"कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय" – चपाती सेकते-सेकते अचानक विचार आया था कि धतूरा हो या गेहूँ हो, दोनो को ही खाने के बाद नशा आता है फिर कैसे कहें कि जिन्हें मधुशाला से परहेज़ है , वे चिट्ठाजगत को पाकशाला समझें. हर रोज़ यहाँ नए चिट्ठे स्वादिष्ट व्यंजनों की तरह अंर्तजाल पर सजे होते हैं. कुछ भावनाओं की चाशनी में डूबे हुए तो कुछ मन को झझकोरते तीखी मिर्च के तड़के के साथ.
मधुशाला कहें या पाकशाला – मादकता तो दोनों में विराजमान है. चिट्ठाजगत की पाठशाला से हम क्या सीख पाते हैं यह तो आने वाला समय ही बताएगा फिलहाल इस समय हम एक नए चिट्ठे को खोल कर उसे पीने पचाने मे लगे हैं.

Monday, October 22, 2007

करुणा भर दो !



पृथ्वी के होठों पर पपड़ियाँ जम गईं
पेड़ों के पैरों मे बिवाइयाँ पड़ गईं.



उधर सागर का भी खून उबल रहा
और नदियों का तन सुलग रहा.




घाटियों का तन-बदन भी झुलस रहा
और झीलों का आँचल भी सिकुड़ रहा.






धूप की आँखें लाल होती जा रहीं
हवा भी निष्प्राण होती जा रही.


तब

अम्बर के माथे पर लगे सूरज के
बड़े तिलक को सबने एक साथ

निहारा ---
और उसे कहा ---
काली घाटियों के आँचल से
माथे को ज़रा ढक लो .
बादलों की साड़ी पर
चाँद सितारे टाँक लो


और फिर

मीठी मुस्कान की बिजली गिरा कर
प्यार की , स्नेह की वर्षा कर दो

धरती को हरयाले आँचल से ढक दो
प्रकृति में, इस महामाया में करुणा भर दो .....!

Saturday, October 20, 2007

कुछ पल पिता की यादों में

बहुत दिनों बाद आज दिल मे गहरा दर्द उठा, गला रुँध गया और आँसू आँखों से बाहर आने को मचलने लगे. सब धुँधला सा हो गया. कुछ देर मन को संयत करके बैठी लेकिन यादों का सैलाब बाँध तोड़ कर आँसुओं के ज़रिए बाहर आ ही गया. मेरे पिता जीवन के अंतिम दो साल अपनी आवाज़ खोकर जिए लेकिन अंत तक आवाज़ वापिस पाने का सपना लेकर चले गए . हमेशा अपनी जेब में छोटी सी नोटबुक और पेन रखते जो उनकी आवाज़ ही थी जो हम सब तक पहुँचती. 'बेबी, तुम्हारी कविताओं की किताब पढ़ना मेरा सपना है.' नोटबुक मे लिख कर दिखाते और ईशारों में कहते कि आवाज़ तो है नही इसलिए चुपचाप बैठ कर बस पढ़ने का आनन्द लूँगा.
संजीत त्रिपाठी जी के ब्लॉग पर उनके पिता जी की पुण्य तिथि पर उस महान आत्मा को श्रद्धाँजलि दी ही थी कि बोधिसत्व जी के ब्लॉग पर जाना हुआ. पिता जी की याद मे लिखी कविता "पिता थोड़े दिन और जीना चाहते थे" मर्म को छू गई या कहिए कि भेद गई. आज तक मन में ग्लानि है जिसे कभी बाहर नहीं निकलने दिया. मन को पत्थर सा कर लिया था. कैसे कहूँ कि मैं अपने ही मोह जाल में फँसीं पिता के हाथ को झटक कर वापिस रियाद लौट आई थी अपने परिवार के पास. चौबीस घण्टों में ही भाई अपने परिवार के साथ अमेरिका से दिल्ली पहुँच गया था. ऐयरपोर्ट से सीधा अस्पताल ही पहुँचा. नन्हे भतीजे को लेकर मैं अस्पताल के बाहर टैक्सी के पास ही खड़ी रही. पापा बेटे बहू को देख कर खुश हुए. आई सी यू में तरह तरह के यंत्रों से जकड़े होने पर भी मुख पर मुक्त हास आ गया था.
चार दिनों में ही दिखने लगा कि पापा यमराज को पछाड़ कर फिर से खड़े हो जाएँगें.
ई ई जी कराने के लिए अस्पताल के दूसरे कोने में जाना था सो पापा को स्ट्रैचर पर लेकर वहाँ पहुँचे. डॉक्टर के पूछने पर मेरे मुहँ से निकल गया कि पापा की उम्र 74 साल है, फिर क्या था न जाने उनके हाथों मे कहाँ से शक्ति आ गई कि मेरा हाथ पकड़ कर उसमे 64 जैसा लिखकर बताना चाह रहे थे कि मैं 74 का नहीं 64 का हूँ. ऑक्सीज़न मास्क में छुपे मुँह की बनावट से पता चल रहा था कि होंठ कुछ कहने को फड़फड़ा रहे हैं पर कह नहीं पा रहे हैं. मुस्करा कर फौरन मैने माफी माँगीं तो सिर हिला कर जैसे कह रहे हों कि आइन्दा ध्यान रखना.
हफ्ते में ही पापा आई सी यू से प्राइवेट कमरे में आ गए थे. तीनों बच्चों को आस-पास देख कर जीने की इच्छा और तेज़ होती दिखाई दे रही थी. उधर मेरे बच्चों का मन शायद नाना और माँ दोनो के बीच में झूल रहा था. मुझे याद करते लेकिन कह न पाते कि माँ वापिस लौट आओ. 17 मार्च 2002 का दिन भुलाए नहीं भूलता जब पापा ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मूक भाव से न जाने की जैसे गुहार कर रहे हों. हाथ की मज़बूत पकड़ अब भी मैं महसूस कर सकती हूँ. भाई ने कहा, ' डैडी , अब तो मैं हूँ , आपका पोता है आपके पास' फिर भी पकड़ ढीली न हुई तो कहा, ' पापा , दीदी को जाने दो, दीदी के बिना वहाँ आपके दोते....., इतना सुनते ही पापा ने हाथ छोड़ दिया. मन पर पत्थर रख कर मैं वहाँ से निकल तो आई लेकिन दिल जैसे पीछे ही छूट गया.
दिल पर मन–मन भर के पत्थर लेकर रियाद अभी पहुँचीं थी कि दो दिन बाद ही खबर पहुँचीं कि पापा हमें छोड़ कर चले गए. 17 मार्च को पापा के हाथों की इतनी मज़बूत पकड़ 19 मार्च को ही ढीली हो जाएगी , सुनकर यकीन ही नहीं हुआ. जड़ सी हो गई.19 मार्च होली का दिन हमारे लिए क्या रंग लेकर आया. सभी रंग फीके से पड़ गए.
कई दिन तक मुझे होश ही नहीं था कि क्या हुआ. कैसे हुआ , क्यों हुआ... क्यों मैं अपने पापा का हाथ छुड़ा कर वापिस लौट आई !!

Friday, October 19, 2007

ईरान का सफर (2)

ईरानी लोगों का लखनवी अन्दाज़ देखने लायक होता है. हर बार मिलने पर झुक कर सलाम करते-करते बहुत समय तक हाल-चाल पूछना हर ईरानी की खासियत है. 'सलाम आगा'-सलाम श्रीमान् 'सलाम खानूम'-सलाम श्रीमती 'हाले शोमा चतुरी?'-आपका क्या हाल है? 'खूबी?'-अच्छे हैं, 'शोहरे शोमा खूबी?'- आपके पति कैसे हैं?, 'खानूम खूबे?'- श्रीमती कैसी हैं?', 'बच्चेहा खूबी?'-बच्चे ठीक हैं? 'खेली खुशहाल शुदम'- बहुत खुशी हुई मिलकर 'ज़िन्दाबशी' – लम्बी उम्र हो,
यदि धन्यवाद 'मरसी' कहा जाए तो फिर एक और जुमला सुनने को मिलता है. 'ख्वाहिश मीकोनाम' या 'काबिल न दरे'. कहने का मतलब है कि हर ईरानी आपसे हाल-चाल पूछता पूछता आधा समय गुज़ार देगा और प्यारी सी मुस्कान के साथ झुक कर सलाम करता रहेगा. आप न चाहते हुए भी मुस्कराएँगें और उनके जाने के बाद अपने दुखते गालों को दबाएँगें.
बाज़ार चलते समय हर मिलने वाले को मुस्कुरा कर , झुक कर सलाम करना जैसे एक रिवाज़ है वहाँ. अगर आप भारत के हैं तो बस एक लम्बी सी लिस्ट की चर्चा शुरु हो जाएगी. वे कहाँ-कहाँ जाना चाहते हैं; उन्हें भारत की फिल्में, वहाँ के पहनावे बहुत अच्छे लगते हैं. जल्दी ही आपसे पूछ लेंगे कि यदि आप साड़ी लाएँ हैं तो उनकी बेटी को एक बार पहना कर तस्वीर खींच दें.
किसी के घर जाने पर सबसे पहले काली चाय चीनी के टुकड़े के साथ (जिसे मिशरी नहीं 'गन्द' कहा जाता है) परोसी जाती है.चाय बनाने का भी उनका एक अलग ही तरीका होता है. केतरी(केतली) जिसमे पानी उबाला जाता है और उस पर उससे छोटी कूरी जो केतरी का ही छोटा रूप होता है , रखी जाती है , जिसमे चाय की पत्ती होती है. साथ मे वहाँ की अलग अलग की तरह की मिठाइयाँ और ताज़े फल परोसने का बहुत चलन है. केतरी और कूरी को कश्मीर मे अलग नाम से जाना जाता है , काफी कुछ मिलते-जुलते रिवाज़ और खान-पान हैं. एक व्यंजन है जिसे ईरान में आब ए गुश्त कहा जाता है, कश्मीर मे गुश्ताबा कहा जाता है. कुछ व्यंजनों की कुछ तस्वीरें हैं जिन्हें देख कर किसी के भी मुहँ में पानी आ जाए.













तीन तरह की रोटी जिन्हें बारबरी, संगक और लवश कहा जाता है. कबाब और चावल सबसे प्रिय व्यंजन होते हैं. इसके अलावा हर प्रदेश के अपने अलग-अलग कई व्यंजन होते हैं. केसर और गुलाब जल से बनाई गई मिठाइयाँ इतनी स्वादिष्ट होती हैं कि खाए चले जाओ बस मुहँ में घुलती जाती हैं. भारत का काजू जिसे वहाँ बादाम ए हिन्द कहा जाता है सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. अखरोट डाल कर कई व्यंजन बनाए जाते हैं. कैसपियन सागर की विशेष प्रकार की मछली स्वादिष्ट ही नहीं, सेहत के लिए भी अच्छी होती है. मछली के अण्डे खाने को मिल जाएँ तो और भी अच्छा. हर भोजन के साथ ताजे हरे पत्ते भी खाए जाते हैं. उत्तरी ईरान की खुशमज़ा गज़ा (स्वादिष्ट भोजन) ही नहीं , वहाँ की आबोहवा भी सेहत के लिए बहुत ही मुफीद है. एक बार जाना हो जाए तो बार-बार जाने का मन करता है.



भोजन के बाद संगीत का स्थान आता है. संगीत के प्रेमी बड़े ही नहीं छोटे-छोटे बच्चे भी होते हैं. भोजन के बाद जैसे ही संगीत की आवाज़ कानों मे पड़ती है , बच्चे, बूढ़े , जवान सभी के पैर थिरकने लगते हैं. मर्यादा के दायरों में रहकर जीवन की विषमताओं से जूझते हुए कुछ देर के लिए सब कुछ भुला कर जैसे वही कुछ पल जी लेते हैं.










क्या यह सच है !!

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Thursday, October 18, 2007

धरा गगन का मिलन असम्भव !

अम्बर की मीठी मुस्कान ने,
रोम रोम पुलकित कर दिया
उससे मिलने की चाह ने,
धरा को व्याकुल कर दिया .
मिलन असम्भव पीड़ा अति गहरी,
धरा गगन की नियति यही रहती
अंबर की आँखों से पीड़ा बरसती,
वसुधा अंबर के आँसू आँचल मे भरती

हरा आँचल लपेट सोई जब निशा के संग धरा
अम्बर निहारे रूप धरा का चन्दा के संग खड़ा

सूरज जैसा अम्बर का लाल हुआ रंग बड़ा
मिलन की तृष्णा बढ़ी , विरह का ताप चढ़ा

जब सूरज चंदा की दो बाँहें अम्बर ने पाईं
और प्यासी धरती को आगोश मे भरने आई

तब पीत वर्ण की चुनरी ओढ़े वसुधा शरमाई
यह सुन्दर छवि वसुधा की नीलाम्बर मन भाई.

सुन्दर युवक !


बैसाखियों के सहारे चलता सुन्दर युवक दिखा
अनोखी आभा से उसका मुख था खिला-खिला.


अंग उसके पीड़ा मे थे, तन का था बल छिना
आँखों के जुगनू रौशन थे, शक्ति से भरी हर शिरा.


उसे कुदरत से था नहीं कोई भी शिकवा न गिला
मस्तक चमकता था सदा किसी भी शिकन बिना.


पैरों में शक्ति नहीं पर पथ से अपने कभी न डिगा
कठिन राह पर आत्म-बल उसका कभी न गिरा.


स्वीकार किया, जिससे जो भी तिरस्कार मिला.
उसने सोचा नहीं था कि मिलेगा कभी यह सिला.


सोचता था अमूल्य है, एक ही मानव-जीवन मिला
कर्म में लगा वह, जीवन जी रहा था चिंता बिना.

Wednesday, October 17, 2007

काम वाली है, बाई नहीं, 'मेड' है

दिल्ली की माई नहीं , न ही बम्बई की बाई है
पाँच महीने पहले ही फीलिपंस से दुबई आई है.

नई फिलोपीनो 'मेड' को देख सर था चकराया .
प्रति घण्टा के हिसाब से तीन घण्टे था बुलाया

किसी कम्पनी में सेक्रेटरी है, आठ से छह तक
करेगी पार्ट-टाइम काम 'मेड' का तीस रोज़ो तक.

हाई हील के सैण्डल ठक ठक करती आई थी
बजते मोबाइल के साथ घर की बैल बजाई थी.

हाय मैडम, कह कर मुस्काई बोली -
दिस इज़ माई फर्स्ट जॉब,
प्लीज़ टेल मी वट टू डू ?

मेनिक्योरड पेडिक्योरड, ब्लो ड्रायर से
सेट किए कटे बाल .
मैं कभी उसे देखती थी , कभी खुद को.

चैट पर ऑनलाइन पति से बतिया रहे थे
जो वेब कैम मे हमे देख भी रहे थे..
इंतज़ार करें, कहा और नई मेड को
लगे देने निर्देश.

डोंट वरी मैडम , कैरी ऑन विद योर वर्क
मुझे भरोसा देकर खुद भी करने लगी वर्क

उसने झाड़-पोंछ शुरू की तो लगा नई है
टोकने की बजाए जैसा भी है सब सही है.

यही सोच कर --
वार्ता खिड़की पर पति से माफी माँगीं
सफाई का साज़ोसामान फिर देने भागी.

लौटी तो देखा वैब-कैम मे पति मुस्कुरा रहे थे
शरारती मुस्कान के साथ मेड को निहार रहे थे.

अरे वाह ! मुझे देख तो ऐसी मुस्कान आई नहीं
क्या मुझमे ऐसी सुन्दरता तुमने पाई नहीं ! !

आहत हुआ मन, न चाहते भी मीठी बातें चन्द कीं
फिर वैब-कैम ही नहीं, वार्ता-खिड़की भी बन्द की .


मेड अपना काम पूरी तल्लीनता से कर रही थी
साथ-साथ अंग्रेज़ी गीत भी गुनगुना रही थी.

मुझे याद आई दिल्ली की अपनी काम वाली
जो आती थी सदा बिना चप्पल पैर खाली.

झूठे बरतन, ठण्डा पानी, घटिया सा साबुन
सेठानी का कर्कश स्वर चुभता सा चाबुक.

हर सुबह देह का कोई अंग नीला सा होता
सूजी आँखें, चेहरे का रंग फीका सा होता.

खुद नन्ही-सी जान, कई रिश्तों का बोझा ढोती
घुटती-पिसती-मरती रहती पर कभी न रोती.

Sunday, October 14, 2007

कजरारी आँखें


काले बुरके से झाँकतीं कजरारी आँखें

कुछ कहती, बोलती सी सपनीली आँखें !


कभी कुछ पाने की बहुत आस होती

कभी उन आँखों में गहरी प्यास होती !


बहुत कुछ कह जातीं वो कजरारी आँखें

काले बुरके से झाँकतीं सपनीली आँखें !


कभी रेगिस्तान की वीरानगी सी छाती

कभी उन आँखों में गहरी खोमोशी होती !


कभी वही खामोशी बोलती सी दिखती

बोलती आँखें खिलखिलाती सी मिलतीं !



Friday, October 12, 2007

तुम



फूलों से खूशबू पाकर , जीवन में महकना तुम
काँटों से ताकत पाकर, दुखों से लड़ना तुम !

हार शब्द को याद कभी न रखना तुम
कठिन पलों को हँस कर गुज़ारना तुम !

वक्त को अपनी मुट्ठी में बंद रखना तुम
रेत सा कभी हाथ से जाने न देना तुम !

गए वक्त की यादों को संजोए रखना तुम
आए वक्त का मुस्कान से स्वागत करना तुम !


कड़वे अतीत को प्यार से सदा याद करना तुम
मीठे भविष्य का सुन्दर सपना तैयार करना तुम !

( आज के दिन यह कविता परिचित- अपरिचित सभी लोगों के नाम )

Thursday, October 11, 2007

हरा भरा इक कोना


किरणों ने ली जब अंगड़ाई , झट से प्यारा सूरज गमका
हुई तारों की धुंधली परछाईं, धीरे से प्यारा चंदा दुबका

धरती पर लोहा, ताँबा और स्टील भी चमका
चिमनी ने भी मुख से अपने धुआँ तब उगला


सुबह सुबह जब बच्चों, बूढों का झुंड जो निकला
कोहरा नहीं, धुएँ से उनकी साँस घुटी, दम निकला


तारकोल की सड़कों से दुर्गन्ध का निकला भभका
क्रोध की लाली से जब सूरज का चेहरा दमका

सड़कों पर निकले बस, स्कूटर और रिक्शा
कानों में तीखा कर्कश उनका हार्न बजा

ईंट-पत्थरों के इस नगर में इमारतों का जाल बिछा
डिश और केबल तारों का सब ओर नया नक्शा खिंचा

खुली खिड़की से बौछार पड़ी आँचल भीगा तन-मन का
भीगी क्यारी की सुगन्ध जो फैली, तब सपना टूटा भ्रम का

सौन्द्रर्य बढ़ेगा अवश्य विश्व निकेतन की सुषमा का
यदि हरा-भरा इक कोना है मेरे घर के आँगन का


यदि हरा-भरा इक कोना है मेरे घर के आँगन का !!

( समीर जी का ''ताज्जुब न करो' लेख पढ़ कर अपनी लिखी एक कविता याद आ गई, समीर जी और उन सबको समर्पित जो पर्यावरण के लिए जन-मानस में चेतना भर रहे हैं)

Wednesday, October 10, 2007

निराश न हो मन।

अकेला ही चलना होगा जीवन-पथ पर
अकेला ही बढ़ना होगा मृत्यु-पथ पर।।
निराश न हो मन।

इस दुनिया में भटक रहा तू व्याकुल होकर
रिश्तों के मोह में उलझा तू आकुल होकर
उस दुनिया में जाएगा तू निष्प्राण होकर
नवरूप पाएगा प्रकाशपुंज से प्रकाशित होकर
निराश न हो मन।

जननी ने जन्म दिया स्नेह असीम दिया
रक्त से सींचा रूप दिया आकार दिया
बहती नदिया सा आगे कदम बढ़ा दिया
ममता ने मुझे निपट अकेला छोड़ दिया
निराश न हो मन।

जन्म के संगी साथी मिल खेले हर पल
जीवन के कई मौसम देखे हमने संग-संग
पलते रहे हम नया-नया लेकर रूप-रंग
बढ़ते-बढ़ते अनायास बदले सबके रंगढंग
निराश न हो मन।

नवजीवन शुरू हुआ जन्म-जन्म का साथी पाकर
नवअंकुर फूटे, प्यारी बगिया महकी खुशबू पाकर
हराभरा तरूदल लहराया, मेरे घर-आंगन में आकर
जीवन-रस को पर सोख लिया पतझर ने आकर
निराश न हो मन ।

(निराशा के दिनों में लिखी गई रचना अनुभूति में छ्पी )

Tuesday, October 9, 2007

एकांकी पलों की सुखद अनुभूति

बहुत दिनों बाद आज अवसर मिला अकेले समय बिताने का , अपनी इच्छानुसार अपने आप से मिलने का एक अलग ही आनन्द है. ऐसा नहीं कि आस-पास के रिश्ते बोझ लगते हैं लेकिन कभी कभी एकांत में अपने आप में खो जाना अलौकिक आनन्द की अनुभूति देता है. घर की दीवारें वही हैं लेकिन उस चार दीवारी में बैठा मन-पंछी चहचहाता हुआ इधर से उधर उड़ता अपने बन्द पंखों को पूरी तरह से खोल उस लम्हे
को जी लेना चाहता है.
चार दिन से इस अवसर को पाने की इच्छा तीव्र से तीव्रत्तम होती जा रही थी लेकिन कुछ न कुछ अनहोनी हमारी इस इच्छा को धूल चटा देती. हम थे कि बस कोशिश में लगे थे क्योंकि सुना है कि कोशिश एक आशा की किरण दिखा ही देती है. हालांकि एकांत कुछ घण्टों का ही है पर है तो सही.
हे मेरे व्याकुल मन , कम समय में बहुत अधिक खुशी पानी हो तो जी जान से लग जाओ. मेरा मन आनन्द के पलों को जितना समेटने की कोशिश कर रहा था , उतना ही वह हाथ से फिसलता जा रहा था. मुट्टी में भरने से बार बार रेत की तरह निकलती जा खुशी को, अलौकिक आनन्द को कैसा रोका जाए. सोचा कि क्यों न हथेली को खोल कर रखूँ. खुली हथेली पर खुशी खुली साँस ले पाएगी.
रिश्तों के साथ भी तो ऐसा ही होता है. जितना हम रिश्तों को बाँधना चाहते हैं , उतना ही वे हमारे दिलों के बन्धन को तोड़ देना चाहते हैं.
खुली हथेली में रखे पानी की थिरकन एहसास कराती है कि जब तक हथेली खुली है , मैं हूँ, हथेली के बन्द होते ही मेरा आसितत्त्व नहीं रहेगा.

Sunday, October 7, 2007

किनारे से लौट आई

समुद्र में दूर तक तैरना चाहा
लहरों से दूर तक खेलना चाहा
पर किनारे से लौट आई।

वारिधि की गहराइयों में उतरना चाहा
भँवरों में उसकी डूबना चाहा
पर किनारे से लौट आई।

रत्नाकर की गर्जना को सुनना चाहा
सिन्धु तल की थाह को पाना चाहा
पर किनारे से लौट आई।

सागर में रवि को उतरते देखना चाहा
चन्द्र-किरणों औ' लहरों से मिल खेलना चाहा
पर किनारे से लौट आई।

उसके प्यार की गंभीरता को परखना चाहा
अपने आसितत्त्व को उस पर मिटाना चाहा
पर किनारे से लौट आई।

Friday, October 5, 2007

ईरान का सफर

(तेहरान से गिलान (रश्त) जाते हुए)


मानव मन प्रकृति की सुन्दरता में रम जाए तो संसार की असुन्दरता ही दूर हो जाए। प्रकृति की सुन्दरता मानव मन को संवेदनशील बनाती है। हाफिज़ का देश ईरान एक ऐसा देश है जहाँ प्रकृति की सुन्दरता देखते ही बनती है। सन 2002 में पहली बार जब मैं अपने परिवार के साथ ईरान गई तो बस वहीं बस जाने को जी चाहने लगा। एक महीने बाद लौटते समय मन पीछे ही रह गया।

कवियों और लेखकों ने जैसे कश्मीर को स्वर्ग कहा है वैसे ही ईरान का कोना कोना अपनी सुन्दरता के लिए जन्नत कहा जा सकता है। सबसे पहला सुखद अनुभव हुआ रियाद के ईरानी दूतावास जाकर । भारत के प्रति अपना स्नेह दिखा कर उन्होंने हमें आश्चर्यचकित कर दिया। हमारे देश की पुरानी हिन्दी फिल्में आज भी याद की जाती हैं। राजकपूर की 'संगम' , अमिताभ बच्चन की 'मर्द' , 'कुली' किसी भी विडियो लाइब्रेरी में आसानी से मिल जाती है। आजकल शाहरुख खान के भी बहुत चर्चें हैं.कई लोगों का सपना है कि अवसर मिलने पर वे भारत ज़रूर देखने जाएँगें.मेरे विचार में मध्य-पूर्वी देशों के लोग भी प्रेम और भाईचारे में किसी से कम नहीं हैं बस आगे बढ़कर हाथ मिलाने की देर है फिर देखिए कैसे दोस्ती निभाते हैं ।

ईरान के लिए वीज़ा आसानी से मिल गया । किसी कारणवश पति को रियाद ही रुकना पड़ा । मैं बच्चों के साथ ईरान के सफ़र पर निकल पड़ी। बच्चे भी कम उत्साहित नहीं थे। ईरानी मित्रों के साथ कुछ ऐसा नाता बन गया था जो अपने नज़दीकी रिश्तेदारों से भी बढ़कर था। ईरान की यात्रा से पहले ही अंर्तजाल के माध्यम से हम उस देश के बारे में बहुत कुछ जान गए थे। रियाद के ईरानी दूतावास की अध्यापिका से ईरानी भाषा सीख कर मैं अपने मित्रों को हैरानी में डाल देना चाहती थी।

यात्रा का दिन आ गया । रियाद से तहरान की हवाई यात्रा ३-४ घंटे की ही थी लेकिन उससे आगे ४-५ घंटे का सफर हमें कार से ही तय करना था। विजय के मित्र अली पहले से ही हवाई अड्डे पर हमारा इन्तज़ार कर रहे थे । समय कैसे कट गया , पता ही नहीं चला । जहाज से उतरते ही स्वागत के लिए खड़े एक अफसर ने मुस्कान के साथ हाथ जोड़कर मुझे सिर ढकने के लिए कहा। मैं भूली नहीं थी, बुरका मेरे हैंड बैग में ही था लेकिन यह नहीं मालूम था कि उतरते ही कोई टोकेगा। खैर मैंने तुरन्त अपना दुपट्टा सिर पर ले लिया। इमिग्रेशन से पहले ही मैंने अपना बुरका निकाला जो सालों से मैं रियाद में पहनती आई हूँ । बुरका पहनते ही मैं जैसे आज़ाद हो गई। "जैसा देश, वैसा भेस" उक्ति सोलह आने सच है। जिस देश में हम रहते हैं , उस देश के कायदे कानून को मान देने से ही अपना मान बढ़ता है।

एयरपोर्ट पर सभी अफसरों और कर्मचारियों ने अपने मीठे व्यवहार से हमें अपनेपन का एहसास कराया। ईरान एक सुन्दर देश तो है ही , वहाँ के लोग भी अच्छे मेहमान नवाज़ हैं। समय अच्छा गुज़रे , ऐसी कामना करते हुए अफसर ने पासपोर्टस हाथ में दे दिए और हम सामान की बैल्ट की ओर रवाना हुए। मित्र पहले से ही वहाँ खड़े इन्तज़ार कर रहे थे । सामान लेकर शीघ्र ही कार की ओर चले क्योंकि आगे की यात्रा हमारे लिए रोमांचक थी ।उत्तरी ईरान का गिलान क्षेत्र कश्मीर की तरह पहाड़ी है और जिस रास्ते से हमें गुज़रना था , वह बर्फ से ढका हुआ था। पहली बार हमें इस तरह नज़दीक से बर्फ देखने का मौका मिला था ।

रास्ते में क्वीन पड़ता है जहाँ का ऑमलेट जिसे 'नीम्ब्रू' कहा जाता है, जिसे 'लवाश' नाम की रोटी और काली चाय के साथ परोसा जाता है। 'गज़ा खेली खुशमज़ा हस्त' मेरे बोलने पर मित्र ही नहीं आसपास के लोग भी हैरानी से देखने लगे। माथे पर बिन्दी देखकर पहले ही सब लोग समझ गए थे कि हम 'मुसाफिर ए हिन्द' हैं। दरअसल इस नाम का एक टी०वी० सीरियल उन दिनों चल रहा था, जिसमें भारतीय लड़की बनकर सीता का रोल अदा करने वाली अदाकारा ईरानी ही थी, उसकी बिन्दी से लोगों को पहचान हो गई कि बिन्दी लगाने वाले लोग भारतीय होते हैं, हालाँकि आजकल कई देशों के लोग फैशन के लिए बिन्दी लगाते हैं।

चाय खत्म होते ही १०-१५ 'लवाश' रोटी साथ बाँध कर हम चल पड़े। प्रकृति का यह सुन्दर रूप कुछ अलग ही था। बर्फ से ढके पहाड़ ऐसे लग रहे थे जैसे ईरान की धरती सफेद आँचल से सिर ढके बैठी हो। कहीं कहीं सफेद आँचल पर हरे रंग का 'पैच वर्क' किया हो या यों कहें कि सफेद आँचल पर हरी टाकियाँ लगी हों।

संगीत आरोग्य साधक चिकित्सा है

संगीत की मधुर लय हमारे जीवन ही नहीँ स्वास्थ्य को भी बहुत प्रभावित करती है.
आजकल संगीत चिकित्सा द्वारा तरह तरह के रोगोँ को काबू पाने की कोशिश की जा रही है. मानव के स्वभाव को जानने के लिए भी संगीत चिकित्सा की जाती है.
विकलांग, ऑटिज़म , मानसिक रोगोँ से पीड़ित और एलज़इमर(Alzheimer)
के रोगियोँ के व्यवहार मेँ बदलाव देखे गए हैँ.
आजकल मानव के व्यवहार को समझने के लिए संगीत एक शक्तिशाली चिकित्सा प्रणाली मानी जा रही है. हाल ही मेँ एक शोध किया गया जिसमेँ समय से पूर्व जन्मे 10 बच्चोँ के कान मेँ हल्की मधुर लय मेँ तीन दिन के लिए लोरियाँ सुनाई गईँ. विशेष ध्यान देने पर पता चला कि इन बच्चोँ के खून मेँ ऑक्सीज़न का स्तर बढ़ा, ह्र्दय गति और साँस की गति लगभग साधारण बच्चोँ जैसी हो गई. स्पष्ट है कि संगीत की लय ऊर्ज़ा प्रदान करने वाली शक्ति है.
लय का स्वरूप स्नायुयोँ को बल देता है और जिन लोगोँ के स्नायु कमज़ोर होते हैँ या उन्हेँ अनुभव करने की शक्ति शून्य हो जाती है, वे इस उत्तम तकनीक द्वारा फिर से स्नायु को नियंत्रित कर लेते हैं. शोध से यह भी पता चला है कि मधुर संगीत सुनने से दिल के रोगियोँ की ह्र्दय गति और रक्त-चाप नियंत्रण मेँ हो जाता है. उच्च रक्त चाप के रोगियोँ की उत्तेजना कम हो जाती है.
हमारे शरीर का सम्पूर्ण शक्ति पुंज, चक्र बिन्दु ध्वनियोँ से प्रभावित होते हैं. उच्च स्वर मेँ श्लोकोँ का पाठ विशेष रूप से प्रभावशाली माना गया है. 'ॐ' के उच्चारण से जो लाभ होते हैँ उनसे हमारा देश ही नहीँ विश्व के अन्य देश भी लाभ उठा रहे हैं.
यदि आप अपने जीवन मेँ संगीत का प्रभावकारी लाभ देखना चाह्ते हैँ तो नीचे दिए कुछ निर्देशोँ का पालन कर के देखिए.....
* दिन भर के तनाव को दूर करने के लिए 20 मिनट के लिए 'ध्वनि स्नान' कीजिए.
हल्का मधुर संगीत लगा कर आराम से सोफे पर या ज़मीन पर लेट जाइए.
* ऐसा धीमा संगीत सुनिए जो साधारण ह्रदय गति जो 72 बीट पर मिनट होती है, से
भी कम हो. बार बार ऐसा धीमा संगीत सुनने पर उत्तेजना शांत होती है.
* साँसों के आने जाने पर ध्यान दीजिए. तनाव को भूल कर संगीत का आनन्द लीजिए.
* कभी कभी बहुत अधिक काम करने से शक्ति का हनन भी हो जाता है. शक्ति लाने के
लिए तेज़ संगीत भी सुन सकते हैँ.
* कठिन समय मेँ जैसे ट्रैफिक मेँ जाना पहचाना , बचपन का या पुराना संगीत मन को शांत करता है.
* वॉकमैन मेँ अपनी मनपसन्द का संगीत लगा कर सैर करने का आनन्द ही अलग
होता है.
* प्रकृति का संगीत सुनकर भी देखिए. समुद्र की उठती गिरती लहरोँ का स्वर, हरे भरे जंगल की शांति का स्वर , बहती हवा का स्वर . सम्भव नहीँ तो ऑडियो टेप्स, सीडीज़ ख़रीद लाइए.

Wednesday, October 3, 2007

वजूद

समझा, जाना और पहचाना मेरे वजूद को
फिर भी बेदर्दी से नकारा मेरे वजूद को.

निराहा, सराहा, प्यार किया तेरे वजूद को
मन-प्राण से स्वीकारा तेरे वजूद को.

धूल जान ठोकर से उड़ाया मेरे वजूद को
सस्ता जानकर धिक्कारा मेरे वजूद को.

क्या पाया तुमने धिक्कार कर मेरे वजूद को
क्योँ अपने काबिल न समझा मेरे वजूद को!

तुमने न जाना, न समझा मेरी चाहत को
अनसुना किया दिल टूटने की आहट को.

बढ़ावा दिया प्यार मेँ भी बनावट को
महसूस किया न प्यार की गरमाहट को.

सोचा है कि पाना है मुझे तेरे वजूद को
और पाना है मुझे अपनी ही पहचान को.

अपने वजूद मेँ मिलाना है तेरे वजूद को
ज़ारी रखना है मुझे इस तलाश को !!

सब हैं त्रस्त !

जीवन की जटिल समस्याओँ को
उलझते देख हम सब हुए हैँ
पस्त
कैसे सुलझाएँ उलझी गुथियोँ को
उलझते देख हम सब हुए हैँ
त्रस्त
अकेले ही इस जटिल जीवन को
जीने को हम सब हुए हैँ
अभिशप्त
दूर कर न पाते अपने दुखोँ को
पर सुख पाने की चाह मेँ हैँ
व्यस्त
लेकिन हे मन ----
आशा के सूरज को होने न देना
अस्त
शालीनता औ' मधुर मुस्कान
बिखेरते हुए रहना सदा
मस्त !!!
(बेटे विद्युत द्वारा बनाया चित्र अनुमति के साथ)

Monday, October 1, 2007

'जय जवान, जय किसान'


तीन महीने का नन्हा सा शिशु माँ की गोद से छूट कर गाय चराने वाले की टोकरी में गिर गया। भगवान का प्रसाद मानकर चरवाहा खुशी-खुशी बालक को घर ले गया क्योंकि उसकी अपनी कोई सन्तान नहीं थी। माता-पिता ने पुलिस में रिपोर्ट कराई तो बच्चा ढूँढ लिया गया।(इस घटना का मेरे पास कोई प्रमाण नहीँ है,बचपन मेँ नाना जी से सुनी थी) वह बच्चा और कोई नहीं हमारे देश के भूतपूर्व प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री थे जिनका जन्म २ अक्टूबर के दिन हुआ। गाँधी जी का जन्मदिन भी 'गाँधी जयंती' के रूप में हर साल मनाया जाता है।
शास्त्री जी के पिता श्रद्धा प्रसाद एक स्कूल टीचर थे, कुछ समय बाद अलाहाबाद में कलर्क बन गए। लाल बहादुर जब डेढ़ साल के ही थे तो पिता का साया सिर से उठ गया। माँ और बहनों के साथ दादा हज़ारी लाल के पास आकर रहने लगे। गाँव में हाई स्कूल न होने के कारण दस साल के लाल बहादुर को मामा के पास वाराणसी भेज दिया गया , जहाँ हरिश्चन्द्र हाई स्कूल में पढ़ने लगे। काशी विद्यापीठ मेँ उन्हेँ 'शास्त्री' की उपाधि मिली.
'जय जवान, जय किसान' का नारा देने वाले नेता धरती से जुड़े महामानव सादा जीवन, उच्च विचार पर विश्वास करते थे. 17 साल की उम्र से ही गाँधी जी से प्रभावित होकर देश के स्वतंत्रता संग्राम मेँ कूद गए थे. पण्डित नेहरू के निधन के बाद देश की बागडोर शास्त्री जी के हाथ मेँ सौपीँ गई थी. हमारे देश के दूसरे प्रधान मंत्री के रूप मेँ अपने कार्य काल मेँ उन्होँने अपनी आत्मशक्ति का , दृढ़ निश्च्यी होने का परिचय दिया. रेल मंत्री हुए या गृह मंत्री हुए. राजनीति से जुड़े जीवन की चर्चा करना मेरा उद्देश्य नहीँ है.
मुझे याद आ रहा है कि जब वे 'होम मिनिस्टर' थे तो लोग उन्हेँ 'होम लेस होम मिनिस्टर' कह कर चिढ़ाया करते थे. जब वे रेल मिनिस्टर थे तो रेल दुर्घटना होने के कारण त्याग पत्र दे दिया था. जेल के दिनोँ मेँ एक बेटी की बीमारी पर 15 दिनोँ के पैरोल पर घर आए पर दुर्भाग्यवश बेटी परलोक सिधार गई तो वापिस जेल लौट गए , यह कह कर कि अब बेटी तो रही नहीँ तो रुक कर क्या करेगेँ.
जीवन मेँ आने वाली कठिनाइयोँ ने उन्हेँ अपनी आग मेँ तपाकर खरा सोना बना दिया था. हरी हरी दूब की तरह दिल के नरम और अपनी मीठी मुस्कान से सब का दिल जीत लेने वाले महापुरुष से हम बहुत कुछ सीख सकते हैँ. बड़े से बड़ा तूफान आने पर हरी भरी घास वहीँ की वहीँ रहती हैँ.
शास्त्री जी एक ऐसा ही एक व्यक्तित्व हैँ जिनके पद-चिन्होँ पर चलने की कोशिश रही है.
भारत रतन शास्त्री जी के आंतरिक गुणोँ को याद करके उन पर अमल करने का प्रयास ही उन्हेँ मेरी श्रद्धाजंलि है.

कुछ पंक्तियाँ श्रद्धाजंलि के रूप मेँ शास्त्री जी के नाम :

शहद की धार को देखा जो इक तार सा
मीठा ख्याल आया इक किरदार का ..
शहद की धार या चलते दरिया की धार
देखा उस धार को बहते इक सार सा ..
तस्सवुर उभरता है एक ही शख्स का
सादा सा पुलिन्दा था ऊँचे विचारोँ का ..
चर्चा की, याद किया बस थोड़ा सा
दर्जा देती हूँ मैँ उसे महामानव का ...