Wednesday, December 12, 2007

आदमीनामा

(कुछ शब्दों के अर्थों को लिखने के लिए एडिट किया था सो पोस्ट ड्राफ्ट में चली गई थी, दुबारा पोस्ट कर रही हूँ.)
कई दिनों की उलझन जिसे संजीत जी की कविता 'ढूँढता हूँ मैं' ने हवा लगाकर और उलझा दिया तो सोचा कि कुछ समय के लिए जीव-जंतुओं की तरह शीतस्वापन (hibernation) की अवस्था में चले जाना चाहिए लेकिन ऐसा संभव हो नहीं पाया. कुछ मित्र हैं जो आभासी दुनिया में वापिस ले आते हैं उनमें प्रत्यक्ष रूप में अर्बुदा है जिसके साथ हर रोज़ बैठकर हिन्दी साहित्य पर ही नहीं जीवन-चक्र पर भी चर्चा होती रहती है. अप्रत्यक्ष रूप में चिट्ठाजगत के सभी चिट्ठाकार जिन्हें पढ़कर गिरते-गिरते संभलने का अवसर मिल जाता है. पारुल जी की पोस्ट देखकर बहुत अच्छा लगा सोचा क्यों न हम भी अपनी बन्द पड़ी किताबों के पन्नों के पंख खोल दें.
आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक का उपलब्ध साहित्य अपने ब्लॉग पर दर्ज करने की सोच को आज मूर्त रूप दे ही दिया. बहुत दिनों से एक कार्य-तालिका बना कर रखी थी. उसके अनुसार सामग्री भी लिखित रूप में तैयार है. शीघ्र ही उसे एक एक करके पोस्ट करने का निश्चय किया है.

नज़ीर अकबराबादी

जन्म आगरा शहर में हुआ. अरबी-फ़ारसी के मशहूर अदीबों से तालीम हासिल की. प्रस्तुत नज़्म 'आदमीनामा' में नज़ीर ने कुदरत के सबसे नायाब बिरादर, आदमी को आईना दिखाते हुए उसकी अच्छाइयों, सीमाओं और संभावनाओं से परिचित कराया है. इस संसार को और भी सुन्दर बनाने के संकेत भी दिए हैं.

आदमीनामा

दुनिया में बादशाह है सो है वह भी आदमी
और मुफ़लिस-ओ-गदा1 है सो है वो भी आदमी
ज़रदार2 बेनवा3 है सो है वो भी आदमी
निअमत4 जो खा रहा है सो है वो भी आदमी
टुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमी

मसज़िद भी आदमी ने बनाई है यां मियाँ
बनते हैं आदमी ही इमाम और खुतबाख्वाँ5
पढ़ते हैं आदमी ही कुरआन और नमाज़ यां
और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतियाँ
जो उनको ताड़ता है सो है वो भी आदमी

यां आदमी पै जान को वारे हैं आदमी
और आदमी पै तेग को मारे है आदमी
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
और सुनके दौड़ता है सो है वो भी आदमी

अशराफ़6 और कमीने से ले शाह ता वज़ीर
ये आदमी ही करते हैं सब कारे7 दिलपज़ीर8
यां आदमी मुरीद है और आदमी ही पीर
अच्छा भी आदमी ही कहाता है ए 'नज़ीर'
और सबमें जो बुरा है सो है वो भी आदमी.

1.गरीब भिखारी 2.मालदार, 3.कमज़ोर, 4.स्वादिष्ट भोजन
5.कुरान का अर्थ बताने वाला, 6.शरीफ शब्द का बहुवचन
7. काम, 8.दिल को लुभाने वाला

11 comments:

नीरज गोस्वामी said...

नजीर साहेब की ये नायाब रचना एक बार फ़िर से पढ़वाने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.
नीरज

बाल किशन said...

अच्छी गजल और अच्छे शायर से परिचय करवाया आपने.
आपको धन्यवाद.
पढ़ कर अच्छा लगा. दिल को छू लेने वाली गजल.

arbuda said...

बहुत अच्छा प्रयास लगा। जिंदगी की भाग दौड़ में साहित्य के लिये भी समय निकालना और हमारे लिये उसे उपलब्ध कराना सचमुच सराहनीय कदम है। बहुत इंतज़ार रहता है ऐसी पोस्ट का।

mamta said...

आपका कार्य सराहनीय है। आगे की कड़ियों का इंतजार रहेगा।

Sanjeet Tripathi said...

बहुत खूब!! सराहनीय कार्य कर रही हैं आप।
शुक्रिया!

Sanjeeva Tiwari said...

नजीर साहब की नजीरें दुनिया देती है, आपने इनसे परिचश्‍ कराया, धन्‍यवाद ।

ज्ञानदत्त पाण्डेय । GD Pandey said...

वाह, आपने आदमी की लिस्ट देदी शब्दार्थ में -
1.गरीब भिखारी 2.मालदार, 3.कमज़ोर, 4.स्वादिष्ट भोजन
5.कुरान का अर्थ बताने वाला, 6.शरीफ शब्द का बहुवचन
7. काम, 8.दिल को लुभाने वाला
सिवाय नम्बर ४ के बाकी सब आदमी का सतरन्गी वैविध्य है!

अविनाश वाचस्पति said...

ज्ञानदत्त जी स्वादिष्ट भोजन में भी जन बैठा है और वो भी है आदमी।
निःसंदेह आदमीनामा एक बेहतरीन रचना है। बेहतरीन को पेश करने वाला भी तो बेहतरीन ही हुआ।

मीनाक्षी said...

नीरज जी अच्छा लगा कि आपको फिर से पढ़कर भी अच्छा लगा. बालकिशन जी सच है कि इस कविता के गहरे भाव दिल में उतर आते है.
अर्बुदा तुमने इस काम को करने का जोश दिलाया है तो साथ देना ही पड़ेगा. ममताजी अब तो बन्द कितावें खुल गई हैं..
छ्त्तीसगढ़ के दो सितारे भी पसन्द कर रहे हैं,आपका आभार
ज्ञान जी, मेरे विचार में जो लाल मिर्च की चटनी और प्याज़ के साथ बाजरे की सूखी रोटी खा रहा है वह उस इंसान के लिए अति स्वादु भोजन है.
अविनाश जी आप ने बेहतरीन रचना और उसे पढ़ाने वाले को बेहतरीन कहा तो भारतीय विचारधारा के अनुसार आप सबसे पहले बेहतरीन हुए जो किसी को बेहतरीन कह रहे हैं.

हर्षवर्धन said...

मीनाक्षीजी
आदमी के बारे में बढ़िया बताया आपने।

इरफ़ान said...

आदमीनामा को आपने यहाँ प्रस्तुत किया.अच्छा लगा. देर से ही सही. बधाई.