Saturday, October 20, 2007

कुछ पल पिता की यादों में

बहुत दिनों बाद आज दिल मे गहरा दर्द उठा, गला रुँध गया और आँसू आँखों से बाहर आने को मचलने लगे. सब धुँधला सा हो गया. कुछ देर मन को संयत करके बैठी लेकिन यादों का सैलाब बाँध तोड़ कर आँसुओं के ज़रिए बाहर आ ही गया. मेरे पिता जीवन के अंतिम दो साल अपनी आवाज़ खोकर जिए लेकिन अंत तक आवाज़ वापिस पाने का सपना लेकर चले गए . हमेशा अपनी जेब में छोटी सी नोटबुक और पेन रखते जो उनकी आवाज़ ही थी जो हम सब तक पहुँचती. 'बेबी, तुम्हारी कविताओं की किताब पढ़ना मेरा सपना है.' नोटबुक मे लिख कर दिखाते और ईशारों में कहते कि आवाज़ तो है नही इसलिए चुपचाप बैठ कर बस पढ़ने का आनन्द लूँगा.
संजीत त्रिपाठी जी के ब्लॉग पर उनके पिता जी की पुण्य तिथि पर उस महान आत्मा को श्रद्धाँजलि दी ही थी कि बोधिसत्व जी के ब्लॉग पर जाना हुआ. पिता जी की याद मे लिखी कविता "पिता थोड़े दिन और जीना चाहते थे" मर्म को छू गई या कहिए कि भेद गई. आज तक मन में ग्लानि है जिसे कभी बाहर नहीं निकलने दिया. मन को पत्थर सा कर लिया था. कैसे कहूँ कि मैं अपने ही मोह जाल में फँसीं पिता के हाथ को झटक कर वापिस रियाद लौट आई थी अपने परिवार के पास. चौबीस घण्टों में ही भाई अपने परिवार के साथ अमेरिका से दिल्ली पहुँच गया था. ऐयरपोर्ट से सीधा अस्पताल ही पहुँचा. नन्हे भतीजे को लेकर मैं अस्पताल के बाहर टैक्सी के पास ही खड़ी रही. पापा बेटे बहू को देख कर खुश हुए. आई सी यू में तरह तरह के यंत्रों से जकड़े होने पर भी मुख पर मुक्त हास आ गया था.
चार दिनों में ही दिखने लगा कि पापा यमराज को पछाड़ कर फिर से खड़े हो जाएँगें.
ई ई जी कराने के लिए अस्पताल के दूसरे कोने में जाना था सो पापा को स्ट्रैचर पर लेकर वहाँ पहुँचे. डॉक्टर के पूछने पर मेरे मुहँ से निकल गया कि पापा की उम्र 74 साल है, फिर क्या था न जाने उनके हाथों मे कहाँ से शक्ति आ गई कि मेरा हाथ पकड़ कर उसमे 64 जैसा लिखकर बताना चाह रहे थे कि मैं 74 का नहीं 64 का हूँ. ऑक्सीज़न मास्क में छुपे मुँह की बनावट से पता चल रहा था कि होंठ कुछ कहने को फड़फड़ा रहे हैं पर कह नहीं पा रहे हैं. मुस्करा कर फौरन मैने माफी माँगीं तो सिर हिला कर जैसे कह रहे हों कि आइन्दा ध्यान रखना.
हफ्ते में ही पापा आई सी यू से प्राइवेट कमरे में आ गए थे. तीनों बच्चों को आस-पास देख कर जीने की इच्छा और तेज़ होती दिखाई दे रही थी. उधर मेरे बच्चों का मन शायद नाना और माँ दोनो के बीच में झूल रहा था. मुझे याद करते लेकिन कह न पाते कि माँ वापिस लौट आओ. 17 मार्च 2002 का दिन भुलाए नहीं भूलता जब पापा ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मूक भाव से न जाने की जैसे गुहार कर रहे हों. हाथ की मज़बूत पकड़ अब भी मैं महसूस कर सकती हूँ. भाई ने कहा, ' डैडी , अब तो मैं हूँ , आपका पोता है आपके पास' फिर भी पकड़ ढीली न हुई तो कहा, ' पापा , दीदी को जाने दो, दीदी के बिना वहाँ आपके दोते....., इतना सुनते ही पापा ने हाथ छोड़ दिया. मन पर पत्थर रख कर मैं वहाँ से निकल तो आई लेकिन दिल जैसे पीछे ही छूट गया.
दिल पर मन–मन भर के पत्थर लेकर रियाद अभी पहुँचीं थी कि दो दिन बाद ही खबर पहुँचीं कि पापा हमें छोड़ कर चले गए. 17 मार्च को पापा के हाथों की इतनी मज़बूत पकड़ 19 मार्च को ही ढीली हो जाएगी , सुनकर यकीन ही नहीं हुआ. जड़ सी हो गई.19 मार्च होली का दिन हमारे लिए क्या रंग लेकर आया. सभी रंग फीके से पड़ गए.
कई दिन तक मुझे होश ही नहीं था कि क्या हुआ. कैसे हुआ , क्यों हुआ... क्यों मैं अपने पापा का हाथ छुड़ा कर वापिस लौट आई !!

11 comments:

Rama said...

मीनाक्षी जी,

आज आपके ब्लाग में आना हुआ....आपके पापा के बारे में पढ़कर आंख भर आई...क्योंकि कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ माता -पिता को अंतिम समय में देख नहीं पाई। बेटियों के लिए यह गम सच में बहुत असहनीय है..पर सहना तो पड़ता ही है... न देख पाने की विवशता और तड़प अवर्णनीय है।बस ज़िंदगी जो दिखाये देखना और सहना पड़ता है....।

आपका शब्द सामर्थ्य और प्रस्तुतीकरण बहुत प्रभावशाली है...आप बहुत संवेदनशील हैं इसलिये इतना अच्छा लिख पाती हैं....मेरे ब्लाग में आने और अपने अमूल्य विचारों से अवगत कराने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.......सस्नेह...

डा. रमा द्विवेदी

हिन्दी टुडे said...

मीनाक्षी जी,आपके मार्मिक चित्रण से आपकी संवेदनशीलता साफ जाहिर है। मगर क्या करें,प्रभु की मर्जी के आगे किसी की नहीं चलती। आपने ब्लाग में अपनी निजी बातों को जिस तरह स्थान दिया। इसके लिये मैं आपकी भाषा-शैली और संवेदनाओं की कद्र करता हूं। क्योंकि मां-बाप का बिछुडना किसी से भी सहन नहीं होता है।

Udan Tashtari said...

यही जीवन का सत्य है. मुझे भी अपनी माँ को खोए ढ़ाई बरस होगे अब तक विश्वास ही नहीं होता कि वो नहीं हैं अब हमारे बीच.

बस, सत्य को स्वीकारना होगा. कितनी मधुर यादें हैं जो हमेशा जीवित रहेंगी.

Beji said...

यादें रहने दीजिये.....ग्लानि निकाल फेंकिये...। आपकी यादों में तो पिताजी आज भी जिन्दा हैं।

Sanjeet Tripathi said...

टची!!

बात को इस नज़रिए से देखिए कि क्या आपके पिता जब तक आपको ग्लानि में डूबा देख सकते थे?

शायद नही

तो फ़िर उनके न होने पर आप इस तरह ग्लानि मे रहकर क्यों उन्हें दुख पहुंचा रही हैं।

उन्हें यादों मे तो रखे ही रहेंगी आप पर इस भावना को हटा दीजिए!!

जोगलिखी संजय पटेल की said...

आप अपने पिता को याद तो कर रहीं हैं...ज़माना वह आ गया है कि शायद मेरा बेटा तो मेरे जाने के बाद स्मशान से सीधे आफ़िस पहुँच जाएगा,या स्मशान भी नहीं आएगा..क्योंकि मेरे जाने के दिन आएँगे तब तक तो कुछ इवेंट मैनेजर्स अंतिम संस्कार भी टर्न की बेसिस पर कर देंगे.आप यदि अपने पिता की सीख का दस फ़ी सदी भी यदि नेकी से निभाते हैं तो समझ लीजिये आपकी अच्छाइयों में आपके पिता मौजूद हैं...मृत्यु ही एक ऐसी सचाई है जो अवश्यंभावी है...

Gyandutt Pandey said...

हम सब इतनी उम्र पा चुके हैं कि प्रत्येक के पास इस प्रकार के दुखद अनुभवों का संग्रह है। और समय के साथ वह बढ़ने ही वाला है।
पर ब्लॉग पर पढ़ कर अपनी स्मृतियाँ ताजा हो जाते हैं और उस समय शायद वे प्रिय जन किसी न किसी चेतना के स्तर पर हमें महसूस कर पाते होंगे।
यह और इस प्रकार की पोस्टें उस मायने में बहुत उपयोगी हैं।
दुख शेयर करने से कम होते हैं। सुख शेयर करने से बढ़ते हैं।

HARI SHARMA said...

aapke pita ke dehant ka dukhad samachar suna. bahut afsos. mujhe yaad aa raha hai kuchh -

Meenu ji agar maine theek se pahchana haito aap yahooper meenu dhanvantri naam se the aur hamaree aapke lambee bate huithee. aapka beta delhi mai bhartee tha. tab bhee aapse charcha hui thee. ek baar aapne dubai ka number diya to baat bhee huithee. shayad aapko yaad aaya ho. hpsharma ( hpsharma_2000, jaipur_cute profile se aapse baat hui thee).

अनूप शुक्ल said...

मर्मस्पर्शी संस्मरण !

namita said...

जिन्दगी आगे बढेगी तो हाथ तो छूटॆगे ही .चिरन्तन सत्य है .पर छूटॆ हुए हाथ यह भी तो बताते हैं कि वे हमारे थे ,हमारे पास थे .देखिये ब्लोगिग की मधुशाला कितनो को अपना बना जाती है .
मन भारी हुआ पर अच्छा लगा . ऐसे ही कहती सुनती रहियेगा

ruchika said...

hi
u wrote so emotional!!!