Thursday, September 27, 2007

वसुधा की डायरी


वसुधा ने आज निश्चय कर लिया था कि जो भी मन में भाव उठ रहे हैं , उन्हें भाप बन कर उड़ने न देगी । जैसे लहरें चट्टानों से टकराती शोर कर रहीं हों, सागर के खर्राटें सुनाई दे रहे थे और वसुधा की नींद उससे दूर भाग रही थी। सोच रही थी कि सुबह चार बजे उठकर सागर को शारजाह एयरपोर्ट छोड़ने जाना है फिर बेटे विकास को भी कॉलेज छोड़ना है। ड्राइवर को बुलाया तो है लेकिन वसुधा को लग रहा था कि इस बार भी ड्राइवर हर बार की तरह अधिक पैसे माँगेंगा। उसने मन में सोचा कि क्यों न खुद ही छोड़ना-लाना शुरु कर दे, जो पैसा बचेगा , उससे वैभव की दवाई आ सकती है। वैभव जो कैमिस्ट से पूछ कर ही दवा खरीदता है कि सॉल्ट सेम होने पर सस्ती कम्पनी की दवा से भी गुज़ारा किया जा सकता है , लेकिन दूसरी तरफ वसुधा बेटे का दर्द ज़्यादा होने पर मँहगीं कम्पनी की दवा खरीद लाती है।
वसुधा जब नौकरी करती थी तब भी उसे कभी नहीं लगता था कि 'हाउस वाइफ' अपनी इच्छा से अपनी ज़िन्दगी बिता सकती है। उसने हमेशा घर में रहने वाली औरतों की तारीफ़ ही की , क्योंकि उसे लगता था कि जो औरत बाहर काम करती है , उसे उतने समय तक घर के काम से छुट्टी मिल सकती है लेकिन जो औरत हमेशा से घर-गृहस्थी के काम में लगी रहती है वह सचमुच महान् है। जब से उसने नौकरी छोड़ी है , तब से जैसे घर के काम उसके पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं । सुबह उठते ही नाश्ता बनाकर विलास को स्कूल के लिए रवाना करके खुद थोड़ी देर के लिए 'जिम' जाती है। वापिस आकर नाश्ता करते-करते अखबार पढ़ना उसे बहुत अच्छा लगता है , वैभव को उठाने के लिए उसे उसका मन-पसंद संगीत लगाना पड़ता है। वैभव ने ही उसे बताया था कि कुछ देशों में रोगियों के इलाज के लिए 'म्यूज़िक थेरेपी' का प्रयोग किया जाता है। वसुधा तब से ही अलग-अलग देशों के सुगम संगीत का पिटारा अपने पास रखती है।

कभी-कभी यादों का सैलाब आता है और हमें दूर तक बहा कर ले जाता है। कोई किनारा नहीं दिखता बस हम बिना हाथ-पैर मारे बहाव से बहे चले जाते हैं । वसुधा को याद आ रहा था जब १५ साल के बेटे को पहली बार बैसाखियाँ लाकर दीं । कलेजा मुँह को आने
लगा था। सागर का दिल तो जैसे ताश के पत्तों का घर जैसा धराशायी हो गया। वसुधा बाथरूम में गई , आँसुओं को रोकने में दिल में टीस उठी तो आँखों में और जलन होने लगी। गले में जैसे कोई फाँस चुभ गई हो। मुहँ धोकर वसुधा मुस्कराती बाहर निकल कर वैभव के कमरे में गई और बड़े सहज भाव से उसे कहा, ' वैभव बेटा , धीरे-धीरे बैसाखी के सहारे चलने की कोशिश करो' 'मम्मी , नहीं चला जाता, अभी दर्द बहुत है।' वैभव के कहने पर मैंने उसे पढ़ने के लिए कहा क्योंकि अगले ही दिन दसवीं के बोर्ड का पहला पेपर था। अपने दर्द को छिपा कर बेटे के दर्द को नज़रअन्दाज़ किया । यह ज़रूरी भी था क्योंकि दर्द को साथी बना कर जीना पड़ेगा। दो साल भटकने के बाद साउदी डाक्टर रीमोटोलिजस्ट ने डाएग्नोज़ किया था कि वैभव को जुवेनाइल रीमोटाइड अर्थराइटस है। यह सुनकर वसुधा और सागर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी। ऐसा कैसे हो सकता है। परिवार में दूर-दूर तक किसी सदस्य को यह बीमारी नहीं थी फिर वैभव को क्यों ।


क्रमशः

5 comments:

Udan Tashtari said...

कभी-कभी यादों का सैलाब आता है और हमें दूर तक बहा कर ले जाता है। कोई किनारा नहीं दिखता बस हम बिना हाथ-पैर मारे बहाव से बहे चले जाते हैं ।

---बहुत गहरी बात कही. आलेख बहुत भावुक कर गया.

अनिल रघुराज said...

घर के काम उसके पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं...इसके अलावा कई जगह बेहद अच्छी अभिव्यक्तियां हैं। और भाव तो बहुत भीना है ही।

मीनाक्षी said...

समीर जी , अनिल जी ,
शुभ प्रभात
जैसे मीठे के साथ नमकीन , प्रशंसा के साथ थोड़ी आलोचना भी हो तो
लिखते समय लेखक सजग रहता है। समीर जी की अधिकत्तर रचनाओं में
व्यंग्य भी मिठास में डूबा होता है, दूसरी तरफ अनिज जी के लेख तीखे,
चटपटे करेले से होते हैं। भोजन में दोनों ही चाहिए।
भाषा शैली अगर प्रभावशाली न हो तो भाव भी प्रभाव नहीं छोड़ पाते।
लेकिन कभी-कभी भावों के भँवर में डूबे लेखक को शब्दों का सहारा नहीं मिल पाता।
"घर के काम उसके पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं." यही इन पंक्तियों में हुआ।
आप जैसे अनुभवी लेखकों की प्रतिक्रिया पाकर सही में प्रोत्साहन मिलता है।
धन्यवाद

parul k said...

मीनाक्षी दी……दो बार पूरा लेख पढा…….

"वसुधा को याद आ रहा था जब १५ साल के बेटे को पहली बार बैसाखियाँ लाकर दीं । कलेजा मुँह को आने
लगा था। " सच्ची दी मन भर आया।

Sanjeet Tripathi said...

सरल शब्दों मे ही जटिलताओं को अभिव्यक्त कर दिया है आपने!!